रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चल रही चर्चा के दौरान कोंटा विधायक कवासी लखमा ने सदन में अपनी बात रखी। जमानत के बाद यह उनका पहला अवसर था जब वे बजट सत्र की कार्यवाही में शामिल हुए। उन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ चल रही कार्रवाई को लेकर सरकार को बधाई दी और कहा कि यदि क्षेत्र में शांति स्थापित होती है तो यह पूरे प्रदेश के लिए सकारात्मक संकेत है।
बस्तर के जंगल और सांस्कृतिक पहचान पर चिंता
लखमा ने अपने वक्तव्य में बस्तर के जंगलों और आदिवासी अस्मिता का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि जंगल और जमीन ही आदिवासी जीवन की आधारशिला हैं। बैलाडीला और अबूझमाड़ जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने आशंका जताई कि विकास और अन्य गतिविधियों के बीच कहीं प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान न पहुंचे।
उन्होंने “बस्तर पंडुम” को लेकर भी चिंता व्यक्त की और कहा कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से लोगों को भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार आदिवासी समाज की एकता और परंपराओं की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण है।
सशर्त अनुमति के तहत उपस्थिति
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, कवासी लखमा को बजट सत्र में शामिल होने की अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी गई है। महाधिवक्ता से अभिमत प्राप्त करने के बाद यह निर्णय लिया गया। शर्तों के अनुसार उन्हें विधानसभा में आने-जाने की सटीक सूचना देनी होगी और सक्रिय मोबाइल नंबर उपलब्ध कराना होगा। साथ ही, उनके विरुद्ध लंबित प्रकरणों पर वे सदन में कोई वक्तव्य नहीं दे सकेंगे।
सीमित दायरे में भागीदारी
स्पीकर ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की शर्तों का पालन अनिवार्य है। लखमा केवल सत्र के दौरान उपस्थित रह सकते हैं और अन्य सामान्य विषयों या अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को ही उठा सकते हैं। राजनीतिक रूप से लखमा की यह उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि उन्होंने एक ओर सरकार की नक्सल नीति की सराहना की, तो दूसरी ओर बस्तर और आदिवासी हितों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर अपनी राजनीतिक सक्रियता का संकेत दिया।