बेमेतरा। शिक्षक दिवस के अवसर पर बेमेतरा जिले के बेरला में जिला स्तरीय शिक्षक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले जिले के अलग-अलग क्षेत्रों के 81 शिक्षकों को सम्मानित किया गया। समारोह में शिक्षकों के साथ शिक्षाविद और प्रतिभावान छात्र-छात्राएं भी शामिल हुए।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर हरिभूमि-INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी मौजूद रहे। वहीं शिक्षाविद डॉ. जवाहर शूरी शेट्ठी ने भी समारोह में शिरकत की। कार्यक्रम का आयोजन संयोजक अवधेश चंदेल के नेतृत्व में किया गया।
शिक्षक को सिर्फ नौकरी तक सीमित न करें : डॉ. हिमांशु द्विवेदी
समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु को विशेष और सर्वोच्च सम्मान दिया गया है। गुरु को केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र और भविष्य का निर्माण करने वाली महत्वपूर्ण शक्ति माना गया है। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ शिक्षक की सामाजिक भूमिका और सम्मान को लेकर कई तरह की चुनौतियां सामने आई हैं। शिक्षक को सिर्फ रोजगार या जीविका का साधन समझना उचित नहीं है। शिक्षक की भूमिका समाज और राष्ट्र निर्माण से जुड़ी हुई है।
डॉ. द्विवेदी ने कहा कि शिक्षकों को जनगणना, पोलियो अभियान और विभिन्न राजनीतिक एवं प्रशासनिक कार्यक्रमों जैसी गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों में भी लगाया जाता है। ऐसी व्यवस्थाओं का असर कई बार शिक्षक की मूल जिम्मेदारी यानी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि समाज और व्यवस्था को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
महान व्यक्तित्वों के निर्माण में गुरुओं की अहम भूमिका
डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने भारतीय इतिहास और परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि महान व्यक्तित्वों के निर्माण में उनके गुरुओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य और छत्रपति शिवाजी जैसे उदाहरणों के जरिए बताया कि सही मार्गदर्शन और संस्कार किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को नई दिशा दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि आज के बच्चे स्वामी विवेकानंद जैसे प्रभावशाली और प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में आगे बढ़ें, तो इसके लिए शिक्षा के साथ-साथ शिक्षक की भूमिका को भी समझना जरूरी है।
गुरुकुल परंपरा का किया उल्लेख
कार्यक्रम में भारतीय गुरुकुल परंपरा का जिक्र करते हुए डॉ. द्विवेदी ने गुरु-शिष्य संबंध की विशेषता पर प्रकाश डाला। उन्होंने रामायण और महाभारत जैसे प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि भारतीय परंपरा में शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि इसे व्यक्ति के संपूर्ण विकास से जोड़कर देखा गया। उन्होंने कहा कि शिक्षक विद्यार्थियों के भीतर ज्ञान के साथ संस्कार, अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए शिक्षकों के सम्मान और उनकी सामाजिक भूमिका को मजबूत करना जरूरी है।
81 शिक्षकों को सम्मान, विद्यार्थियों का भी बढ़ा उत्साह
शिक्षक सम्मान समारोह में जिले के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा के लिए योगदान देने वाले 81 शिक्षकों का सम्मान किया गया। इस दौरान शिक्षकों के कार्यों को सराहा गया और उनके योगदान को समाज के सामने रेखांकित किया गया। आयोजकों के मुताबिक, ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर काम करने वाले शिक्षकों को प्रोत्साहित करना और विद्यार्थियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा पैदा करना है। शिक्षक और विद्यार्थियों के सम्मान से उनका मनोबल बढ़ता है तथा समाज में शिक्षा के महत्व को लेकर सकारात्मक संदेश जाता है। समारोह में जिलेभर से पहुंचे शिक्षकों, शिक्षाविदों और विद्यार्थियों ने कार्यक्रम में भाग लिया। शिक्षक दिवस के मौके पर आयोजित यह जिला स्तरीय आयोजन शिक्षा और शिक्षक की सामाजिक भूमिका पर केंद्रित रहा।