सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट पर मौजूद खतरों से बचाने के नाम पर उन्हें डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता। इसके बजाय ऐसे प्रभावी सुरक्षा उपाय अपनाने चाहिए, जो बच्चों को हानिकारक सामग्री और ऑनलाइन शोषण से बचाने के साथ उनके अधिकारों की भी रक्षा करें।
15 अक्टूबर 2026 को दिए गए आदेश में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इंटरनेट तक पहुंच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बच्चों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया। अदालत ऑनलाइन बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) की पहचान, रिपोर्टिंग और उसे हटाने के उपायों से संबंधित मामले की सुनवाई कर रही थी।
बच्चों को इंटरनेट से वंचित करना समाधान नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट को बच्चों के लिए शिक्षा, जानकारी और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए बच्चे नई चीजें सीख सकते हैं, अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं और दूसरे लोगों से जुड़ सकते हैं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के साथ विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए इंटरनेट सीखने और जानकारी हासिल करने का अहम साधन है।
ऐसे में ऑनलाइन दुनिया में मौजूद खतरों के आधार पर बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच पूरी तरह बंद करना उचित समाधान नहीं है। अदालत के अनुसार, कार्रवाई का मुख्य लक्ष्य हानिकारक सामग्री, उसके प्रसार और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को बनाया जाना चाहिए।
सोशल मीडिया पर ‘चाइल्ड मोड’ लागू करने का सुझाव
बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए अदालत ने उम्र के अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया। इसके तहत सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कई तरह के उपाय अपनाए जा सकते हैं।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
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चाइल्ड मोड: बच्चों की उम्र के हिसाब से सोशल मीडिया के इस्तेमाल को सुरक्षित बनाना।
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डिफॉल्ट प्राइवेट सेटिंग: बच्चों के अकाउंट की गोपनीयता पहले से सुरक्षित रखना।
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अनजान लोगों से संपर्क पर नियंत्रण: बच्चों तक अजनबियों की पहुंच को सीमित करने के विकल्प देना।
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हानिकारक सामग्री पर कार्रवाई: बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री की पहचान कर उसे हटाने की व्यवस्था मजबूत करना।
इन उपायों का उद्देश्य बच्चों को इंटरनेट के फायदों से वंचित किए बिना ऑनलाइन जोखिमों को कम करना है।
अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) से कैसे जुड़ा है इंटरनेट का अधिकार?
सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल के महत्व पर चर्चा करते हुए संविधान के दो प्रमुख प्रावधानों का संदर्भ दिया।
अनुच्छेद 21: यह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है।
अनुच्छेद 19(1)(a): यह नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
इंटरनेट के जरिए जानकारी प्राप्त करने और विचार व्यक्त करने के अवसर इन अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। अदालत ने बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उनकी स्वतंत्रता और डिजिटल पहुंच को बनाए रखने की जरूरत पर बल दिया।
पीठ ने अपने विचारों के संदर्भ में 2020 के अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ और 2025 के प्रज्ञा प्रसून मामले का भी उल्लेख किया। इन मामलों में इंटरनेट, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल पहुंच से जुड़े मुद्दों पर विचार किया गया था।
ऑनलाइन बाल शोषण रोकने के लिए केंद्र सरकार से कदम उठाने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से ऑनलाइन बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री पर रोक लगाने के लिए आवश्यक उपायों पर विचार करने को कहा है। इनमें दिशानिर्देश तैयार करना और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करने जैसे कदम शामिल हैं।
जरूरत पड़ने पर संबंधित कानूनों में बदलाव की संभावनाओं पर भी विचार किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य ऑनलाइन सेवाएं उपलब्ध कराने वाले प्लेटफॉर्म की भूमिका अहम होगी, ताकि आपत्तिजनक सामग्री की पहचान, शिकायत और उसे हटाने की व्यवस्था प्रभावी हो सके।
मामले में आगे की कार्रवाई और अनुपालन से संबंधित जानकारी अदालत के समक्ष रखी जानी है।
क्या अब बच्चे बिना किसी रोक-टोक के सोशल मीडिया चला सकेंगे?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का यह अर्थ नहीं है कि बच्चों के इंटरनेट या सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सभी तरह के प्रतिबंध खत्म हो गए हैं। अदालत ने बच्चों की सुरक्षा के लिए उचित और प्रभावी उपायों की जरूरत को भी स्वीकार किया है।
मुख्य जोर इस बात पर है कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए ऐसा तरीका अपनाया जाए, जिससे उनकी डिजिटल पहुंच और मौलिक अधिकार पूरी तरह प्रभावित न हों। यानी बच्चों की सुरक्षा के लिए व्यापक प्रतिबंध लगाने के बजाय उम्र के अनुरूप सेटिंग, गोपनीयता और हानिकारक सामग्री को रोकने जैसे उपायों को प्राथमिकता दी जाए।