बस्तर की दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसे उन गांवों में, जहां वर्षों तक भय और हिंसा का माहौल रहा, अब आज़ादी की असली तस्वीर दिखाई दी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व और गृहमंत्री विजय शर्मा के मार्गदर्शन में सुकमा जिले के 10 अति-संवेदनशील गांवों में आज़ादी के बाद पहली बार तिरंगा फहराया गया। यह क्षण केवल ध्वजारोहण का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निर्णायक विजय का प्रतीक बना।
गणतंत्र दिवस 2026 बना ऐतिहासिक दिन
सुकमा जिले के नियद नेल्लानार क्षेत्र के तुमालभट्टी, वीरागंगलेर, मैता, पालागुड़ा, गुंडाराजगुंडेम, नागाराम, वंजलवाही, गोगुंडा, पेदाबोडकेल और उरसांगल गांवों में पहली बार गणतंत्र दिवस का आयोजन हुआ। इन गांवों में अब तक कभी भी राष्ट्रीय पर्व नहीं मनाया गया था। सुरक्षा बलों की निरंतर तैनाती और नए सुरक्षा कैंपों की स्थापना से यह संभव हो सका।
सुरक्षा के भरोसे से मुख्यधारा में लौटे ग्रामीण
मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के चलते ग्रामीणों ने वर्षों पुराने डर को पीछे छोड़ते हुए खुले मन से इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लिया। बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों ने राष्ट्रगान के साथ तिरंगे को सलामी दी और “भारत माता की जय” व “वंदे मातरम्” के नारों से पूरे इलाके को गुंजायमान कर दिया।
विकास, विश्वास और सुरक्षा का सशक्त मॉडल
कलेक्टर अमित कुमार और पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण की सक्रिय भूमिका से प्रशासन की पहुंच इन दूरस्थ गांवों तक सुनिश्चित हुई। ग्रामीणों के चेहरों पर दिखाई देती उम्मीद और भरोसा इस बात का संकेत है कि शासन की विश्वास आधारित नीति जमीन पर असर दिखा रही है। यह बदलाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि विकास की ओर बढ़ता ठोस कदम है।
लोकतंत्र की जड़ें अंतिम छोर तक मजबूत : एसपी किरण चव्हाण
पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने कहा कि यह सिर्फ ध्वजारोहण कार्यक्रम नहीं है, बल्कि सुकमा के अंतिम गांव तक लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होने का प्रमाण है। सुरक्षा बलों ने न केवल इलाके को सुरक्षित किया, बल्कि ग्रामीणों के साथ विश्वास का रिश्ता भी बनाया। लक्ष्य है—विकास, विश्वास और सुरक्षा के जरिए स्थायी शांति स्थापित करना।
‘पूना मार्गेम’ अभियान से बदली सुकमा की तस्वीर
छत्तीसगढ़ सरकार का “पूना मार्गेम” अभियान, जिसका गोंडी भाषा में अर्थ है ‘नया रास्ता’, अब जमीन पर साकार होता दिख रहा है। जिन इलाकों में कभी गोलियों की आवाज़ गूंजती थी, वहां अब तिरंगे की शान और विकास की उम्मीद लहरा रही है। यह बस्तर में शांति और प्रगति के नए युग की शुरुआत मानी जा रही है।