धमतरी। कहते हैं कि अगर एक माँ ठान ले तो असंभव भी संभव हो जाता है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के कुरुद निवासी चित्रकार बसंत साहू की जिंदगी इसी बात की जीवंत मिसाल है। 95 प्रतिशत दिव्यांगता और तीन दशक से अधिक समय तक बिस्तर पर रहने के बावजूद बसंत ने अपनी कला के दम पर राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। उनकी इस सफलता के पीछे उनकी माँ अहिल्याबाई साहू का अथाह संघर्ष, त्याग और अटूट विश्वास सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ा रहा।
एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी
साल 1995 में हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे ने बसंत साहू की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। हादसे में उनकी स्पाइनल कॉर्ड गंभीर रूप से प्रभावित हुई, जिसके बाद गले के नीचे का पूरा शरीर निष्क्रिय हो गया। डॉक्टरों ने भी उम्मीद लगभग छोड़ दी थी, लेकिन माँ अहिल्याबाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने बेटे को मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखा और हर परिस्थिति में उसका हौसला बढ़ाती रहीं। परिवार की मुश्किल परिस्थितियों के बीच माँ का विश्वास ही बसंत की सबसे बड़ी ताकत बन गया।
खुद कैंसर से लड़ते हुए बेटे का संभाला हौसला
बसंत की देखभाल करते हुए अहिल्याबाई साहू खुद भी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। ब्रेस्ट कैंसर जैसी पीड़ा सहने के बावजूद उन्होंने बेटे की सेवा में कभी कमी नहीं आने दी। उनका यही त्याग और समर्पण बसंत के जीवन में नई उम्मीद लेकर आया। धीरे-धीरे बसंत ने रंगों और कैनवास के जरिए अपनी नई दुनिया बनाई। उन्होंने अपनी पीड़ा और संघर्ष को कला में बदल दिया।
राष्ट्रपति सम्मान तक पहुँची पहचान
शारीरिक रूप से असहाय होने के बावजूद बसंत साहू ने चित्रकला को अपनी पहचान बना लिया। उनकी पेंटिंग्स में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, संवेदनाएं और संघर्ष की झलक साफ दिखाई देती है। उनकी कला को देश और विदेश में सराहना मिली। उत्कृष्ट चित्रकारी के लिए उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। उनकी बनाई पेंटिंग्स देश की प्रतिष्ठित आर्ट गैलरीज और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंच चुकी हैं।
“बसंत फाउंडेशन” से बच्चों को दे रहे नई उड़ान
अपनी माँ से मिले संस्कारों को आगे बढ़ाते हुए बसंत साहू ने “बसंत फाउंडेशन” की स्थापना की। यह संस्था विशेष रूप से बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क कला प्रशिक्षण देती है। संस्था दिव्यांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का भी काम कर रही है। यहां से कई प्रतिभाशाली छात्र निकलकर खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंच चुके हैं।
बसंत साहू बोले – माँ ने जीना सिखाया
बसंत साहू कहते हैं कि उनकी माँ ने केवल उनकी देखभाल ही नहीं की, बल्कि उन्हें जिंदगी को नए नजरिए से जीना सिखाया। उनके मुताबिक आज जो पहचान और सम्मान उन्हें मिला है, वह पूरी तरह उनकी माँ के संघर्ष और विश्वास का परिणाम है।
मदर्स डे पर प्रेरणा बनी यह कहानी
मदर्स डे के मौके पर अहिल्याबाई साहू और बसंत साहू की यह कहानी हर उस परिवार के लिए प्रेरणा है, जो कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा है। यह कहानी बताती है कि माँ का प्यार केवल ममता नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और उम्मीद की सबसे बड़ी ताकत होता है।