राजीव मिश्रा, दतिया : जहां आमतौर पर सूर्य या चंद्र ग्रहण के दौरान देशभर के मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं, वहीं दतिया स्थित सिद्धपीठ श्री पीताम्बरा पीठ में यह परंपरा अलग है। यहां ग्रहणकाल में भी मां बगलामुखी के दर्शन और पूजा-अर्चना निरंतर जारी रहती है।
ग्रहण का समय साधना का काल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण का समय विशेष साधना का काल माना जाता है। अधिकांश मंदिरों में इस दौरान नियमित पूजा और आरती स्थगित कर दी जाती है, लेकिन पीताम्बरा पीठ में ग्रहण को आध्यात्मिक ऊर्जा और मंत्र साधना के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जाता है। ग्रहण लगते ही यहां मंत्रोच्चार और जाप की ध्वनि और अधिक तीव्र हो जाती है।
साधना की परंपरा
मान्यता है कि पीठाधीश्वर स्वामीजी महाराज के समय से ही यहां ग्रहणकाल में पट बंद न करने की परंपरा चली आ रही है। मंदिर में मां को निरंतर, सर्वकालिक शक्ति स्वरूप मानते हुए पूजा-पाठ जारी रखा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि ग्रहण के दौरान किया गया जाप और साधना विशेष फलदायी होता है।
आचार्य ने बताया महत्व
मंदिर के मुख्य आचार्य विष्णु कांत मोरिया के अनुसार ग्रहणकाल साधना की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली समय होता है। उन्होंने बताया कि मां पीताम्बरा की कृपा से यहां अनवरत जाप की परंपरा निभाई जाती है और इस दौरान मंदिर के पट बंद नहीं किए जाते। यह समय आध्यात्मिक ऊर्जा के जागरण का माना जाता है।
ग्रहण की छाया भले ही आकाश में दिखाई दे, लेकिन दतिया की इस तपोभूमि में भक्ति और आस्था का प्रकाश निरंतर प्रज्वलित रहता है। यही कारण है कि यहां ग्रहणकाल को विराम नहीं, बल्कि साधना और श्रद्धा के विशेष अवसर के रूप में मनाया जाता है।