चीन ने देश की जातीय नीतियों में बड़ा बदलाव करते हुए 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ' लागू कर दिया है। 1 जुलाई से प्रभावी इस कानून का उद्देश्य सभी मान्यता प्राप्त जातीय समुदायों के बीच एक समान राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करना बताया गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता और साझा विकास को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है।
शिक्षा व्यवस्था में भी किए गए अहम बदलाव
नई व्यवस्था के तहत देशभर के सरकारी और निजी स्कूलों में मैंडेरिन भाषा को शिक्षा का प्रमुख माध्यम बनाया जाएगा। साथ ही पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक मूल्यों और देशभक्ति से जुड़े विषयों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। सरकार चाहती है कि नई पीढ़ी में साझा राष्ट्रीय पहचान और सरकारी नीतियों के प्रति जागरूकता बढ़े।
अभिभावकों की भूमिका भी तय
कानून में केवल शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी तय नहीं की गई है, बल्कि परिवारों की भूमिका पर भी जोर दिया गया है। अभिभावकों से अपेक्षा की गई है कि वे बच्चों को राष्ट्रीय मूल्यों, सामाजिक समरसता और सरकारी नीतियों के सम्मान के प्रति प्रेरित करें। सरकार का मानना है कि परिवार और शिक्षा संस्थान मिलकर सामाजिक एकता को मजबूत कर सकते हैं।
मानवाधिकार संगठनों ने उठाए सवाल
इस कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई मानवाधिकार संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अल्पसंख्यक समुदायों की भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र के कुछ मानवाधिकार विशेषज्ञ भी पहले चीन की जातीय नीतियों को लेकर चिंता जता चुके हैं और सांस्कृतिक विविधता की सुरक्षा पर जोर देते रहे हैं।
सांस्कृतिक संस्थानों पर भी रहेगा फोकस
नए कानून के तहत संग्रहालय, पुस्तकालय, थिएटर और अन्य सांस्कृतिक संस्थानों में ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाएगा जो राष्ट्रीय एकता और आधिकारिक इतिहास से जुड़े विषयों को प्रमुखता दें। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन को विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक समन्वय बढ़ाने के लिए योजनाएं तैयार करने का अधिकार भी दिया गया है।
विदेशों में अलगाववाद पर भी कड़ी नजर
कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि चीन के अनुसार कोई व्यक्ति या संगठन विदेश में रहकर अलगाववाद या देश की एकता के खिलाफ गतिविधियों का समर्थन करता है, तो उसके खिलाफ चीनी कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसी प्रावधान को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।