नई दिल्ली। 77वें गणतंत्र दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर भारत ने साहस और समर्पण की एक नई परिभाषा गढ़ी। भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन और अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला को देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारत के बढ़ते अंतरिक्ष सामर्थ्य का भी प्रतीक बन गया है। कर्तव्य पथ पर हुए भव्य समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान प्रदान किया। गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर अशोक चक्र की घोषणा के साथ ही शुभांशु शुक्ला इतिहास रचने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री बन गए, जिन्हें यह सर्वोच्च वीरता सम्मान प्राप्त हुआ।
युद्ध नहीं, फिर भी वीरता की मिसाल:
शुभांशु शुक्ला की कहानी यह साबित करती है कि वीरता सिर्फ सीमा पर लड़ाई तक सीमित नहीं है। अंतरिक्ष जैसी अनजान, जोखिम भरी और चुनौतीपूर्ण दुनिया में मानव सीमाओं को आगे बढ़ाना भी उतना ही साहस मांगता है। ऑर्बिट में हर सेकंड, हर निर्णय जीवन और मिशन के भविष्य से जुड़ा होता है। यही कारण है कि उनका यह सम्मान केवल तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि अदम्य साहस, मानसिक मजबूती और नेतृत्व क्षमता की पहचान है।
41 साल बाद भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान:
राकेश शर्मा की ऐतिहासिक अंतरिक्ष यात्रा के 41 वर्षों बाद, शुभांशु शुक्ला की उड़ान ने भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन को नई दिशा दी। यह उपलब्धि गगनयान मिशन के लिए एक निर्णायक मोड़ मानी जा रही है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।
लखनऊ से अंतरिक्ष तक का असाधारण सफर:
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जन्मे शुभांशु शुक्ला ने महज 17 वर्ष की उम्र में अपने सपनों को उड़ान दी। कारगिल युद्ध और IAF एयर शो से प्रेरित होकर उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) के लिए आवेदन किया—वह भी माता-पिता को बताए बिना। साल 2006 में वे भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट बने। अपने करियर में उन्होंने Su-30MKI, MiG-21, MiG-29, Jaguar और Hawk जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों पर 2,000 से अधिक उड़ान घंटे पूरे किए। इसके बाद वे टेस्ट पायलट और कॉम्बैट लीडर बने। साथ ही, IISc बेंगलुरु से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल कर तकनीकी दक्षता को भी नई ऊंचाई दी।
गगनयान मिशन और अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण:
साल 2019 में ISRO ने शुभांशु शुक्ला को भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन के लिए चुना। इसके बाद उन्होंने रूस के यूरी गगारिन कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर में कड़ा प्रशिक्षण लिया। इसके साथ ही, NASA और ISRO के संयुक्त प्रशिक्षण सत्रों में भी उन्होंने भाग लिया। वे गगनयान मिशन के लिए चुने गए चार फाइनल उम्मीदवारों में शामिल रहे—जो अपने आप में उनकी योग्यता और भरोसे का प्रमाण है।
देश के सपनों का नया प्रतीक:
अशोक चक्र से सम्मानित शुभांशु शुक्ला आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि नए भारत के अंतरिक्ष सपनों का चेहरा बन चुके हैं। उनका सफर यह संदेश देता है कि भारत अब सिर्फ धरती पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भी नेतृत्व के लिए तैयार है। शुभांशु शुक्ला को मिला अशोक चक्र केवल एक पदक नहीं, बल्कि उस साहस का सम्मान है जो इंसान को अज्ञात की ओर बढ़ने की ताकत देता है। कर्तव्य पथ पर दिया गया यह सलाम, आने वाले वर्षों में भारत की अंतरिक्ष गाथा का स्वर्णिम अध्याय बनेगा।