नई दिल्ली। संसद में दोबारा पेश किए जाने वाले परिसीमन विधेयक को लेकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सूत्रों के हवाले से ऐसी जानकारी सामने आ रही है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) इस बार परिसीमन बिल का समर्थन कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो इसे विपक्षी राजनीति में बड़ा घटनाक्रम माना जाएगा, क्योंकि एनसीपी (एसपी) इंडिया गठबंधन का अहम सहयोगी दल है। हालांकि, इस संबंध में पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
सूत्रों के हवाले से समर्थन की चर्चा
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (एसपी) संसद में परिसीमन बिल के पक्ष में अपना रुख अपना सकती है। इस संभावित फैसले को केंद्र सरकार के लिए राहत और विपक्ष के भीतर नई राजनीतिक बहस की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
यदि पार्टी विधेयक के समर्थन में मतदान करती है, तो संसद में सरकार की रणनीति को मजबूती मिल सकती है।
अप्रैल के विशेष सत्र में नहीं मिल पाया था आवश्यक बहुमत
इस वर्ष अप्रैल में संसद के विशेष सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित एक संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया था। उस समय विपक्ष के विरोध के कारण सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सकी थी।
वोटिंग के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 वोट और विरोध में 230 वोट पड़े थे। सदन में उपस्थित सदस्यों की संख्या के आधार पर सरकार आवश्यक बहुमत से पीछे रह गई थी, जिसके चलते विधेयक पारित नहीं हो सका।
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेत दिया था कि सरकार भविष्य में बेहतर तैयारी के साथ इस विधेयक को फिर से सदन में लाएगी।
क्या है परिसीमन की प्रक्रिया?
परिसीमन (Delimitation) वह प्रक्रिया है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। इसका उद्देश्य जनसंख्या में हुए बदलाव के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का संतुलित पुनर्गठन करना होता है, ताकि सभी क्षेत्रों को समान प्रतिनिधित्व मिल सके।
यह प्रक्रिया आमतौर पर नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर की जाती है।
राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है असर
यदि एनसीपी (एसपी) वास्तव में परिसीमन बिल का समर्थन करती है, तो इसका असर संसद में सरकार और विपक्ष दोनों की रणनीति पर पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा होने पर विधेयक को पारित कराने की सरकार की संभावनाएं पहले की तुलना में मजबूत हो सकती हैं।
हालांकि, अंतिम स्थिति संसद में विधेयक पेश होने और विभिन्न दलों के आधिकारिक रुख सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।