नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जाहिर की है। प्रदूषण के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने सवाल उठाया कि दिल्ली के खुशनुमा मौसम का आनंद तो हर कोई ले रहा है, लेकिन हवा को साफ रखने के लिए आखिर क्या प्रयास किए जा रहे हैं? सुनवाई में एमिकस क्यूरी अपराजिता ने प्रदूषण की भयावह स्थिति बताते हुए कहा कि दिल्ली के लोग हर दिन ऐसी हवा में सांस ले रहे हैं, जो करीब 30 सिगरेट पीने के बराबर नुकसान पहुंचा सकती है।
उन्होंने अदालत को बताया कि राजधानी में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) गंभीर श्रेणी में बना हुआ है और प्रदूषण का असर लोगों की सेहत के साथ उनकी आवाज पर भी पड़ रहा है। इस दौरान अदालत में वाहनों से निकलने वाले धुएं, पराली जलाने और किसानों की आर्थिक परेशानियों जैसे अहम मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
प्रदूषण के लिए सिर्फ पराली को जिम्मेदार ठहराना गलत
सुनवाई के दौरान CJI ने कहा कि हाल ही में हुई बारिश के कारण दिल्ली में प्रदूषण का स्तर कुछ कम हुआ था। इस पर एमिकस क्यूरी ने स्पष्ट किया कि राजधानी की खराब हवा के लिए केवल पराली जलाने को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।
उनका कहना था कि दिल्ली पहले से ही प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है और पराली जलाने की घटनाएं स्थिति को और गंभीर बना देती हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में प्रदूषण के प्रमुख कारणों में परिवहन व्यवस्था भी शामिल है। इसके अलावा पराली जलाना भी प्रदूषण बढ़ाने वाला एक बड़ा कारक है।
दिल्ली में बाहर से आने वाले वाहन भी बढ़ा रहे प्रदूषण
सुनवाई के दौरान वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर विशेष रूप से चिंता जताई गई। एमिकस क्यूरी ने कहा कि दिल्ली में वाहनों की संख्या काफी ज्यादा है। इस पर CJI ने कहा कि समस्या सिर्फ राजधानी में पंजीकृत गाड़ियों की नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से भी बड़ी संख्या में वाहन दिल्ली पहुंचते हैं।
उन्होंने कहा कि दूसरे राज्यों से आने वाले वाहनों की स्थिति और उनसे निकलने वाले धुएं की निगरानी करना बड़ी चुनौती है। कोई वाहन भले ही दिल्ली में केवल दो घंटे के लिए आए, लेकिन इस दौरान वह प्रदूषण फैलाने में योगदान दे चुका होता है।
वहीं, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने अदालत को बताया कि सरकार प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए कदम उठा रही है। प्रदूषण जांच केंद्रों पर पीयूसी (PUC) प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को जियो-टैग किया जा रहा है। इसके साथ ही अधिक धुआं छोड़ने वाले वाहनों पर कार्रवाई और उन्हें रोकने के लिए भी उपाय किए जा रहे हैं।
किसानों के पास मशीनें, लेकिन ईंधन खरीदने के पैसे नहीं
सुनवाई में पराली जलाने की समस्या और किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी चर्चा हुई। एमिकस क्यूरी ने बताया कि केंद्र और राज्य सरकारों ने किसानों को पराली प्रबंधन के लिए कृषि मशीनें और उपकरण उपलब्ध कराए हैं, लेकिन इन मशीनों को चलाने के लिए जरूरी ईंधन का खर्च उठाना छोटे किसानों के लिए मुश्किल हो रहा है।
उन्होंने कहा कि वाटर प्रिजर्वेशन एक्ट के कारण धान की बुवाई में देरी हुई, जिससे फसल कटाई और अगली फसल की तैयारी का समय भी प्रभावित हुआ।
इस पर CJI ने कहा कि पराली जलाने की घटनाओं में कमी आ रही है और किसान अब धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई की तैयारी में जुट रहे हैं।
दिवाली के गिफ्ट पर भी सुप्रीम कोर्ट में हुई चर्चा
प्रदूषण पर सुनवाई के दौरान दिवाली पर उपहार देने की परंपरा का मुद्दा भी सामने आया। एक वकील ने टिप्पणी की कि शायद दिवाली पर गिफ्ट देने की परंपरा को बंद करने की जरूरत है।
इस पर CJI ने इसे समाज में सांस्कृतिक बदलाव से जोड़ते हुए कहा कि लोगों को समझना होगा कि हमारी वास्तविक संस्कृति क्या है और हमें किन परंपराओं को अपनाना चाहिए।
वहीं, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने त्योहारों के बढ़ते व्यावसायीकरण पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि त्योहारों को केवल वस्तुओं और लेन-देन तक सीमित कर देना भी एक समस्या है।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई में साफ तौर पर सामने आया कि दिल्ली के प्रदूषण से निपटने के लिए केवल पराली जलाने पर रोक लगाना पर्याप्त नहीं है। वाहनों से होने वाले उत्सर्जन, किसानों की समस्याओं और सामाजिक स्तर पर जागरूकता जैसे कई पहलुओं पर एक साथ काम करने की जरूरत है।