मुकेश प्रजापति, भैरूंदा: सीहोर जिले के भैरूंदा अनुभाग में रसूखदार तेल व्यवसायियों और प्रशासनिक रवैये का एक ऐसा खतरनाक गठजोड़ सामने आया है, जो किसी भी दिन पूरे शहर को राख के ढेर में बदल सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजरायल-ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते युद्ध के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, जिसके मद्देनजर जिला कलेक्टर और पेट्रोलियम कंपनियों ने साफ निर्देश जारी किए थे कि ईंधन का वितरण बेहद संतुलित और विधिक रूप से केवल वाहनों में ही किया जाए।
इसके बावजूद, भैरूंदा शहर की घनी बस्ती के बीच संचालित मां रेवा फ्यूल स्टेशन पर खुलेआम नियमों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया है। यहां रात के अंधेरे में तो छोड़िए, दिन के उजाले में भी सैकड़ों की संख्या में प्लास्टिक के अवैध कुप्पों और गैलनों में धड़ल्ले से डीजल भरा जा रहा है, जिससे पेट्रोल पंप से लेकर मुख्य सड़क तक कतारें लगी हुई हैं।
रसूखदारों को खुली छूट क्यों?
यदि कोई छोटा दुकानदार या आम नागरिक विधिक गाइडलाइन का जरा सा भी उल्लंघन कर दे, तो राजस्व और खाद्य विभाग की टीमें तत्काल दुकान सील करने और भारी जुर्माना लगाने पहुंच जाती हैं। लेकिन मां रेवा फ्यूल स्टेशन के संचालक के हौसले इतने बुलंद हैं कि खुलेआम सैकड़ों लीटर ज्वलनशील पदार्थ खुले बर्तनों में बांटा जा रहा है, और उसी रास्ते से दिन भर गुजरने वाले प्रशासनिक अफसरों की गाड़ियां आंखें मूंदकर निकल जाती हैं।
बस्ती के बीच बारूद का ढेर
यदि इस पेट्रोल पंप की भौगोलिक और विधिक स्थिति को बारीकी से समझा जाए, तो यह पूरा सुरक्षा तंत्र के फेल होने का सबसे बड़ा लाइव सुबूत है। यह फ्यूल स्टेशन चारों तरफ से सघन आबादी और रिहायशी मकानों से घिरा हुआ है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में बिना किसी सुरक्षा मानकों के ट्रैक्टरों और अन्य वाहनों पर सैकड़ों प्लास्टिक के डिब्बे लादकर ले जाना एक चलते-फिरते मानव बम जैसा है।
पेट्रोलियम विधिक नियमों के अनुसार, खुले बर्तनों या प्लास्टिक में डीजल-पेट्रोल का वितरण सख्त वर्जित है क्योंकि घर्षण से पैदा हुई एक छोटी सी चिंगारी भी पास की पूरी बस्ती को अपनी चपेट में ले सकती है। ऐसे में यदि कोई अनहोनी होती है, तो क्या इसकी जिम्मेदारी मुनाफाखोरी में जुटे पंप संचालक की होगी या कुंभकर्णी नींद सो रहे प्रशासनिक अमले की?
खरीफ बुवाई की मजबूरी
इस पूरे गोरखधंधे के पीछे आगामी कृषि सीजन का एक बड़ा गणित काम कर रहा है। जून का महीना शुरू होते ही क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई के लिए ट्रैक्टरों और कृषि यंत्रों के लिए डीजल की मांग चरम पर पहुंच गई है। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर पंप संचालक मुनाफा कमाने के लिए किसानों को खुलेआम स्टॉक दे रहा है। किसान भी मजबूरी में आकर बड़ी मात्रा में डीजल खरीदकर अपने कच्चे और पक्के घरों में असुरक्षित तरीके से रख रहे हैं, जिससे ग्रामीण अंचलों में भी आगजनी का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
राजनैतिक संरक्षण या मिलीभगत?
शहर के प्रबुद्ध नागरिकों का सीधा सवाल है कि जब मुख्य मार्ग पर सुबह से ही खाली कुप्पों का तांडव शुरू हो जाता है, तो स्थानीय पुलिस, राजस्व निरीक्षक और खाद्य सुरक्षा अधिकारी किस विधिक कोठरी में सो रहे हैं? क्या इस खुली मनमानी के पीछे किसी बड़े राजनेता का वरदहस्त काम कर रहा है, या फिर यह 'मंथली' और टेबल के नीचे होने वाली आपसी मिलीभगत का एक और डरावना उदाहरण है?
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