नई दिल्ली: हॉर्मुज स्ट्रेट में तीन वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ बड़े स्तर पर सैन्य कार्रवाई करते हुए 80 से अधिक सैन्य ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की है। अमेरिकी सेना का दावा है कि इस ऑपरेशन का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार की सुरक्षा सुनिश्चित करना और ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना था। हालांकि, इस खबर में कई ऐसे दावे हैं जिनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। अमेरिका और ईरान दोनों की ओर से अलग-अलग दावे किए गए हैं, इसलिए आधिकारिक और स्वतंत्र स्रोतों से पुष्टि का इंतजार किया जाना चाहिए।
किन सैन्य ठिकानों को बनाया गया निशाना?
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार हमलों में ईरान के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इनमें एयर डिफेंस सिस्टम, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, तटीय रडार स्टेशन, एंटी-शिप मिसाइल लॉन्चर, ड्रोन लॉन्च साइट, IRGC की तेज गति वाली नौकाएं, बंदर अब्बास, केश्म द्वीप और सीरिक क्षेत्र के सैन्य ठिकाने शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बंदर अब्बास स्थित शहीद हक्कानी पोर्ट के आसपास भी सैन्य कार्रवाई की गई।
हॉर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमला
अमेरिका का कहना है कि हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजर रहे तीन व्यापारिक जहाजों पर हमला किया गया। इनमें MT Al Rekayyat (मार्शल आइलैंड्स), MT Wedyan (सऊदी अरब), MT Cyprus Prosperity (लाइबेरिया) शामिल हैं, बताया गया कि एक टैंकर में आग लग गई जबकि अन्य दो जहाजों को नुकसान पहुंचा। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार किसी के हताहत होने की पुष्टि नहीं हुई है।
ईरान ने दी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी
ईरान ने अमेरिकी हमलों की कड़ी निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन बताया है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस कार्रवाई के परिणामों की पूरी जिम्मेदारी अमेरिका की होगी। ईरान के अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि यदि सैन्य कार्रवाई जारी रही तो उसका जवाब भी दिया जाएगा।
तेल कारोबार पर भी अमेरिका का बड़ा फैसला
सैन्य कार्रवाई के साथ अमेरिका ने ईरानी तेल निर्यात से जुड़ी अस्थायी छूट भी समाप्त कर दी है। इसके अलावा संयुक्त समुद्री सूचना केंद्र (JMIC) ने हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए खतरे का स्तर बढ़ाकर "Severe" कर दिया है।
मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव
इस घटनाक्रम के बाद पूरे मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।