नई दिल्ली: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Hormuz Strait को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ईरान ने संकेत दिया है कि वह इस अहम समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर प्रति बैरल कम से कम 1 डॉलर का टोल वसूलना चाहता है। इतना ही नहीं, उसने इसे संभावित सीजफायर शर्तों में भी शामिल किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में चिंता बढ़ गई है।
वैश्विक नियमों को चुनौती?
अब तक अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के तहत प्राकृतिक जलमार्गों जैसे Hormuz Strait से गुजरने वाले जहाजों पर किसी प्रकार का शुल्क नहीं लगाया जाता। केवल मानव-निर्मित नहरें जैसे Suez Canal और Panama Canal ही टोल वसूलती हैं। ऐसे में ईरान की यह पहल दशकों पुराने वैश्विक नियमों को चुनौती दे सकती है।
अजय बग्गा की चेतावनी
भारत के जाने-माने वित्तीय विशेषज्ञ Ajay Bagga ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि अगर ईरान को टोल लगाने की अनुमति मिलती है, तो यह एक खतरनाक ट्रेंड की शुरुआत होगी। उनके मुताबिक, इसके बाद Strait of Malacca में सिंगापुर Bosporus Strait में तुर्की भी इसी तरह के शुल्क लागू कर सकते हैं।
भारत को क्या करना चाहिए?
अजय बग्गा ने सुझाव दिया है कि भारत को भी अपने रणनीतिक स्थान का फायदा उठाते हुए Andaman and Nicobar Islands के दक्षिण में समुद्री मार्गों पर टोल लगाने पर विचार करना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से Indira Point का जिक्र किया, जो भारत का सबसे दक्षिणी छोर है। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट के बेहद करीब स्थित है।
रणनीतिक महत्व: अंडमान का समुद्री मार्ग
इंदिरा पॉइंट के पास का इलाका इंडोनेशिया के Sabang के बेहद करीब है। दोनों के बीच दूरी लगभग 150 किमी है, जो इसे वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम बनाती है। यह क्षेत्र Strait of Malacca के प्रवेश द्वार के पास स्थित है, जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार गुजरता है। भारत और इंडोनेशिया पहले से ही इस क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और पोर्ट डेवलपमेंट को लेकर सहयोग कर रहे हैं।
तेल कीमतों पर असर
अगर ईरान अपनी योजना लागू करता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ सकता है। अनुमान है कि हर शिपमेंट पर करीब 2.5 मिलियन डॉलर तक अतिरिक्त लागत आ सकती है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। होर्मुज स्ट्रेट पर टोल लगाने की ईरान की योजना केवल एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा जियो-पॉलिटिकल कदम है। इससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों में बदलाव और वैश्विक व्यापार में नई प्रतिस्पर्धा की शुरुआत हो सकती है। भारत सहित कई देश अब इस पर अपनी रणनीति तय करने के दबाव में हैं।