धार : इंदौर हाई कोर्ट द्वारा धार भोजशाला को मंदिर घोषित करने के बाद से शहर में जश्न का माहौल है। लोग पटाखे फोड़कर और रंग गुलाल खेलकर हाईकोर्ट के फैसले जहां स्वागत कर रहे है। तो वही दूसरी तरफ मुस्लिम पक्ष ने इस ऐतिहासिक फैसले का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। बता दें कि पिछले 4 साल से भोजशाला को लेकर सुनवाई चल रही थी। जो आखिरकार खत्म हो गई है।
मुस्लिम पक्ष अलग जमीन की मांग कर सकते हैं
हाई कोर्ट ने भोजशाला स्थल को वाग्देवी मंदिर घोषित करते हुए यह भी साफ़ कर दिया है कि अब यहां नमाज नहीं होगी। बल्कि भोजशाला में सिर्फ पूजा पाठ किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह स्ट्रक्चर एक मंदिर है और मुसलमान मस्जिद के लिए कोई दूसरी जमीन मांग सकते हैं। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने पूरे परिसर को मंदिर बताते हुए कहा कि यहां सरकार मूर्ति स्थापित कर सकती है।
सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट पर होगा कड़ा एक्शन
हाई कोर्ट द्वारा हिन्दुओं के पक्ष में लिए गए इस फैसले को लेकर शहर और परिसर के आसपास लगभग 1,200 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। ताकि मुस्लिम और हिन्दुओं के बीच किसी तरह का टकराव न हो। इसके साथ ही प्रशासन ने पूरे इलाके को बैरिकेड्स से सील कर दिया है। तो वही धार कलेक्टर राजीव रंजन मीणा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए साफ किया है कि सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट करने वालों के खिलाफ NSA जैसी कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
जानें क्या है पूरा विवाद?
यह विवाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) संरक्षित भोजशाला परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का मंदिर और प्राचीन विद्या केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है। वहीं जैन समुदाय के एक पक्ष का दावा है कि यह मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल था।
हिंदू पक्ष की ओर से हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर भोजशाला को मंदिर घोषित करने तथा हिंदू समाज को वर्षभर 24 घंटे पूजा-अर्चना का अधिकार देने की मांग की गई थी। इस मामले को लेकर पिछले चार साल से सुनवाई चल रही थी। लंबी न्यायिक प्रक्रिया और बहस पूरी होने के बाद अब हाई कोर्ट ने धार भोजशाला को मंदिर करार दिया है। इस फैसले के बाद से हिंदू पक्ष में खुशी का माहौल है।
क्या है इतिहास?
इतिहास की बात करें तो हजार साल पहले धार में परमार वंश का शासन था. यहां पर 1000 से 1055 ईस्वी तक राजा भोज ने शासन किया. राजा भोज सरस्वती देवी के अनन्य भक्त थे. उन्होंने 1034 ईस्वी में यहां पर एक महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में 'भोजशाला' के नाम से जाना जाने लगा. इसे हिंदू सरस्वती मंदिर भी मानते थे.
ऐसा कहा जाता है कि 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला को ध्वस्त कर दिया. बाद में 1401 ईस्वी में दिलावर खान गौरी ने भोजशाला के एक हिस्से में मस्जिद बनवा दी. 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने दूसरे हिस्से में भी मस्जिद बनवा दी. 1875 में यहां पर खुदाई की गई थी. इस खुदाई में सरस्वती देवी की एक प्रतिमा निकली थी.