Iraq oil offer: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और तेल सप्लाई में रुकावट के बीच इराक ने भारत सहित अपने प्रमुख खरीदार देशों को सस्ते कच्चे तेल का बड़ा ऑफर दिया है। हालांकि इस ऑफर के साथ एक ऐसी शर्त जुड़ी है, जो इसे फायदेमंद से ज्यादा जोखिमभरा बना सकती है।
क्यों सस्ता हुआ इराकी तेल?
दरअसल, होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव के कारण तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव के चलते इस अहम समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में इराक अपने तेल को बेचने के लिए मजबूर है और उसने टर्म कॉन्ट्रैक्ट वाले खरीदारों के लिए कीमतों में भारी कटौती की है।
क्या है मुश्किल शर्त?
इराक का सस्ता तेल खरीदने के लिए एक जरूरी शर्त है—तेल की लोडिंग फारस की खाड़ी के उन टर्मिनलों से होगी, जहां तक पहुंचने के लिए जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरना पड़ेगा। यह रास्ता फिलहाल बेहद असुरक्षित माना जा रहा है, जिससे जहाज, क्रू और कार्गो को गंभीर खतरा हो सकता है।
भारत पर क्या असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और इराक लंबे समय से उसका प्रमुख सप्लायर रहा है। 2022 में भारत के कुल तेल आयात में इराक की हिस्सेदारी करीब 26% थी। 2024 में भारत ने इराक से लगभग 28-29 अरब डॉलर का तेल खरीदा, 2026 की शुरुआत में इराक से आयात बढ़कर 11.8 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया।लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में संकट के बाद अप्रैल 2026 में यह आयात लगभग शून्य हो गया।
वैश्विक संकट और भारत की रणनीति
रूस पर लगे प्रतिबंधों के बाद भारत पहले ही वैकल्पिक स्रोत तलाश रहा है। ऐसे में इराक का यह ऑफर एक अवसर जरूर है, लेकिन सुरक्षा जोखिम इसे जटिल बना देता है।
आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत सस्ते तेल के लालच में इस जोखिम को उठाएगा या फिर सुरक्षित विकल्पों की तलाश जारी रखेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को आर्थिक फायदे और सामरिक जोखिम के बीच संतुलन बनाकर फैसला लेना होगा।