नई दिल्ली। देश के 42 पूर्व न्यायाधीशों और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े रहे लोगों ने एक खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को लेकर चल रही बयानबाजी पर चिंता जाहिर की है। पत्र में कहा गया है कि बिना ठोस सबूत के संवैधानिक संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगाने से लोकतांत्रिक व्यवस्था और इन संस्थाओं के प्रति आम लोगों का विश्वास कमजोर हो सकता है। पूर्व न्यायाधीशों ने विशेष रूप से चुनावों में कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों का उल्लेख करते हुए राजनीतिक दलों, मीडिया और नागरिकों से तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखने की अपील की है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन बिना प्रमाण उन्हें बदनाम करना उचित नहीं है।
संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना और उन्हें बदनाम करने में अंतर
खुले पत्र में कहा गया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर सवाल उठाना गलत नहीं है। हालांकि, संस्थाओं को बार-बार ‘चोर’, ‘कठपुतली’ या मिलीभगत करने वाला बताने जैसी टिप्पणियों से बचना चाहिए। पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि आलोचना तथ्यों और तर्कों पर आधारित होनी चाहिए। बिना पर्याप्त प्रमाण के लगाए गए आरोप जनता के मन में संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा कर सकते हैं। पूर्व न्यायाधीशों ने आगाह किया कि लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता का भरोसा कायम रहना जरूरी है।
‘वोट चोरी’ के आरोपों पर क्या कहा गया?
पत्र में चुनाव प्रक्रिया को लेकर लगाए जा रहे ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर भी चिंता जताई गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि यदि चुनाव में अनियमितता का कोई मामला सामने आता है, तो उसे उचित मंच पर प्रमाणों के साथ उठाया जाना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक दलों से अपील की है कि चुनाव परिणामों या मतदान प्रक्रिया पर सवाल उठाने के लिए चुनाव आयोग और न्यायालयों जैसे संस्थागत माध्यमों का इस्तेमाल किया जाए। किसी आरोप को बार-बार दोहराने के बजाय उसके समर्थन में ठोस तथ्य प्रस्तुत करना आवश्यक है।
मतदाता सूची में संशोधन पर भी पत्र में चर्चा
खुले पत्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि मतदाता सूची को समय-समय पर दुरुस्त करना चुनावी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मृत मतदाताओं के नाम हटाना, एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नामों की पहचान करना और दूसरे स्थान पर जा चुके मतदाताओं की जानकारी को अपडेट करना बताया गया है। पत्र में चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकारों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया को अपने आप में गलत नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि, ऐसी प्रक्रियाओं को लेकर उठने वाली शिकायतों और वास्तविक चिंताओं का समाधान तथ्यों तथा लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में जनता के भरोसे को लेकर चिंता
पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि भारत में चुनाव के माध्यम से कई बार सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हुआ है। अलग-अलग राजनीतिक दलों ने चुनाव में जीत हासिल की है और हार का सामना भी किया है। पत्र के अनुसार, यदि लगातार यह दावा किया जाता है कि चुनाव में लोगों की वास्तविक पसंद के मुताबिक वोटों की गिनती नहीं होती, तो इससे चुनावी व्यवस्था के प्रति जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने लोकतंत्र की मजबूती के लिए राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवैधानिक प्रक्रियाओं और कानूनी संस्थाओं के प्रति जिम्मेदार रवैया अपनाने की जरूरत बताई है।
राजनीतिक दलों से प्रमाण के साथ शिकायत करने की अपील
खुले पत्र में राजनीतिक दलों से कहा गया है कि वे चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगाए जाने वाले आरोपों में जिम्मेदारी बरतें। यदि किसी दल के पास चुनाव में गड़बड़ी या अनियमितता से संबंधित जानकारी है, तो उसे संबंधित अधिकारियों या न्यायालय के सामने साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। पत्र में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि चुनावी व्यवस्था को लेकर किसी भी तरह की शिकायत की निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के तहत समाधान होना चाहिए।
मीडिया को भी दी गई जिम्मेदारी निभाने की सलाह
पूर्व न्यायाधीशों ने मीडिया से अपील की है कि वह किसी भी आरोप या दावे को प्रकाशित अथवा प्रसारित करने से पहले उसकी तथ्यात्मक जांच करे। केवल किसी आरोप को बार-बार दोहराने से वह प्रमाणित तथ्य नहीं बन जाता। पत्र में कहा गया है कि खबरों के प्रसारण में सत्यता, निष्पक्षता और जिम्मेदारी का ध्यान रखना जरूरी है। मीडिया की भूमिका केवल आरोपों को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे तथ्यों की पड़ताल कर जनता तक सही जानकारी पहुंचानी चाहिए।
संवैधानिक संस्थाओं से पारदर्शिता बनाए रखने का आग्रह
खुले पत्र में संवैधानिक संस्थाओं से भी कहा गया है कि वे पारदर्शिता के साथ काम करें और जनता की जायज चिंताओं का स्पष्ट जवाब दें। वहीं, आम नागरिकों से अपील की गई है कि वे किसी भी दावे पर विश्वास करने से पहले उसकी सत्यता जांचें और अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालने से बचें। पत्र के अंत में कहा गया है कि संवैधानिक संस्थाएं किसी एक सरकार की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना लोकतंत्र के हित में है।
खुले पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 42 पूर्व न्यायाधीश और अन्य व्यक्ति
पत्र में शामिल नामों और पदों की उपलब्ध सूची के अनुसार, हस्ताक्षरकर्ताओं में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, पूर्व मुख्य न्यायाधीश तथा संवैधानिक और कानूनी संस्थाओं से जुड़े लोग शामिल हैं।
सूची में प्रमुख नाम:
हेमंत गुप्ता — सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
पंकज मित्तल — सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
बी. सी. पटेल — जम्मू-कश्मीर और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
सुभ्रो कमल मुखर्जी — कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
परमोड कोहली — सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
एस. एम. सोनी — गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और गुजरात के पूर्व लोकायुक्त
एस. एन. ढींगरा — दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
कृष्णा एस. दीक्षित — कर्नाटक और ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
एस. एन. श्रीवास्तव — इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और छत्तीसगढ़ के पूर्व लोकायुक्त
जे. ए. पी. श्रीवास्तव — मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
उपलब्ध विवरण में मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, इलाहाबाद, पंजाब एवं हरियाणा, केरल, उत्तराखंड और अन्य हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों के नाम भी शामिल हैं।
नोट: प्रकाशन से पहले सभी 42 हस्ताक्षरकर्ताओं के नाम, पद और खुले पत्र के मूल पाठ का आधिकारिक स्रोत से मिलान कर लें।