भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत को और मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्रालय ने आठ नेक्स्ट जनरेशन कॉर्वेट्स के निर्माण के लिए 53,866.50 करोड़ रुपये के अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए हैं। इस परियोजना के तहत कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (GRSE) और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) युद्धपोतों का निर्माण करेंगी। इन जहाजों के नौसेना में शामिल होने से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री निगरानी और सुरक्षा क्षमता को मजबूती मिलेगी।
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में 2 नवंबर 2026 को नई दिल्ली के कर्तव्य भवन-2 में इन अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए गए। समझौते के अनुसार, GRSE पांच युद्धपोत तैयार करेगी, जबकि GSL को तीन कॉर्वेट्स के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई है।
दो भारतीय शिपयार्ड मिलकर बनाएंगे 8 युद्धपोत
आठ नेक्स्ट जनरेशन कॉर्वेट्स के निर्माण को कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने 30 अक्टूबर 2026 को मंजूरी दी थी। इसके दो दिन बाद रक्षा मंत्रालय ने दोनों शिपयार्ड के साथ 53,866.50 करोड़ रुपये का करार पूरा कर लिया।
इस परियोजना के तहत तैयार होने वाले युद्धपोतों की आपूर्ति 2030 से शुरू होने की उम्मीद है। ये आधुनिक जहाज नौसेना के सतह पर तैनात युद्धपोतों के बेड़े में शामिल होंगे। इनका डिजाइन ऐसा होगा कि ये कम आकार के बावजूद तेज गति से चल सकेंगे और अलग-अलग समुद्री अभियानों को अंजाम दे पाएंगे।
क्या है कॉर्वेट और क्यों खास होंगे ये युद्धपोत?
कॉर्वेट समुद्री युद्ध में इस्तेमाल होने वाले अपेक्षाकृत छोटे और तेज युद्धपोत होते हैं। इनका आकार फ्रिगेट और डिस्ट्रॉयर जैसे बड़े युद्धपोतों से छोटा होता है, लेकिन आधुनिक तकनीक से लैस होने के कारण ये कई अहम सैन्य जिम्मेदारियां निभा सकते हैं।
नेक्स्ट जनरेशन कॉर्वेट्स में अत्याधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, एंटी-शिप मिसाइल, एयर डिफेंस और पनडुब्बी रोधी युद्ध प्रणाली जैसी क्षमताएं शामिल होंगी। इनका इस्तेमाल समुद्री निगरानी से लेकर दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों से निपटने तक किया जा सकेगा।
2,000 टन वजन और 30 नॉट्स की रफ्तार
प्रस्तावित युद्धपोतों का वजन करीब 2,000 टन होगा। इन्हें भारतीय नौसेना के स्वदेशी स्टेल्थ डिजाइन पर तैयार किया जाएगा। स्टेल्थ तकनीक का उद्देश्य जहाज की रडार पर पहचान होने की संभावना को कम करना है।
इनकी अधिकतम गति करीब 30 नॉट्स बताई गई है। आधुनिक तकनीक और तेज रफ्तार के साथ ये युद्धपोत समुद्र में लंबे समय तक निगरानी और सैन्य अभियान संचालित करने में सक्षम होंगे।
हिंद महासागर से अरब सागर तक बढ़ेगी निगरानी
इन आठ युद्धपोतों को कई तरह के समुद्री अभियानों के लिए तैयार किया जाएगा। इनमें पनडुब्बी रोधी अभियान (ASW), समुद्री निगरानी, खोज और हमला, तटीय सुरक्षा तथा समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा से जुड़े मिशन शामिल हैं।
हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में इनकी तैनाती से नौसेना की निगरानी क्षमता बढ़ेगी। इसके अलावा बड़े युद्धपोतों पर लगातार निगरानी और सुरक्षा अभियानों का दबाव भी कम करने में मदद मिलेगी।
ये नए कॉर्वेट्स नौसेना के पहले से मौजूद चार कामोर्टा-क्लास कॉर्वेट्स के साथ भी काम करेंगे। कामोर्टा-क्लास युद्धपोत मुख्य रूप से पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए तैयार किए गए हैं।
आत्मनिर्भर भारत और सागर विजन को मिलेगा बढ़ावा
आठों युद्धपोतों का निर्माण देश में ही किया जाना रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। इससे भारतीय शिपबिल्डिंग कंपनियों को बड़े रक्षा प्रोजेक्ट पर काम करने का अवसर मिलेगा और स्वदेशी युद्धपोत निर्माण की क्षमता को भी बढ़ावा मिलेगा।
यह परियोजना प्रधानमंत्री के 'सागर' यानी Security and Growth for All in the Region विजन से भी जुड़ी है। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, सहयोग और स्थिरता को मजबूत करना है। नए स्टेल्थ कॉर्वेट्स के शामिल होने से भारतीय नौसेना की समुद्री अभियानों को अंजाम देने की क्षमता में इजाफा होगा।