51 Years of Emergency: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख एक ऐसे दौर की शुरुआत के रूप में दर्ज है, जिसे आज भी देश के सबसे विवादास्पद राजनीतिक अध्यायों में गिना जाता है। इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया गया था। 21 महीनों तक चले इस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और प्रेस की स्वतंत्रता पर कड़ी सेंसरशिप लागू की गई। आज, 25 जून 2026 को आपातकाल लागू हुए 51 वर्ष पूरे हो चुके हैं। आइए जानते हैं कि आखिर किन परिस्थितियों में यह फैसला लिया गया और इस दौरान देश ने क्या-क्या देखा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से शुरू हुआ राजनीतिक संकट
आपातकाल की पृष्ठभूमि 1971 के लोकसभा चुनाव से जुड़ी हुई थी। रायबरेली सीट से जीत हासिल करने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने अदालत में चुनौती दी थी। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया और उन पर छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की सीमित अनुमति दी, लेकिन राजनीतिक संकट गहरा चुका था।
जेपी आंदोलन ने बढ़ाया सरकार पर दबाव
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन तेज हो गया। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित विशाल रैली में जेपी ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग करते हुए देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया। बढ़ते जनदबाव और राजनीतिक अस्थिरता के बीच सरकार ने आपातकाल लगाने का फैसला लिया।
आधी रात को लागू हुआ आपातकाल
25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देते हुए राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए।26 जून की सुबह देशवासियों को पता चला कि भारत अब आपातकाल के दौर में प्रवेश कर चुका है।
मौलिक अधिकार हुए निलंबित
आपातकाल लागू होने के साथ ही नागरिकों के कई मौलिक अधिकार प्रभावी रूप से सीमित कर दिए गए। प्रशासन को व्यापक शक्तियां मिल गईं और मीसा (MISA) जैसे कानूनों के तहत बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू हो गईं।अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह समेत कई प्रमुख विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया।
प्रेस सेंसरशिप: मीडिया पर लगा सबसे बड़ा प्रतिबंध
आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर सख्त नियंत्रण लगाया गया। अखबारों में प्रकाशित होने वाली खबरों को सरकारी सेंसर अधिकारियों की मंजूरी के बाद ही प्रकाशित किया जा सकता था। दिल्ली के कई प्रमुख समाचार पत्रों के दफ्तरों की बिजली तक काट दी गई थी ताकि सरकार विरोधी खबरें प्रकाशित न हो सकें। कई अखबारों ने विरोध स्वरूप अपने संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिए थे।
जबरन नसबंदी और तुर्कमान गेट विवाद
आपातकाल के सबसे विवादित अध्यायों में जबरन नसबंदी अभियान और दिल्ली के तुर्कमान गेट में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शामिल हैं।संजय गांधी की पहल पर चलाए गए परिवार नियोजन अभियान के दौरान कई स्थानों पर जबरन नसबंदी के आरोप लगे। वहीं तुर्कमान गेट क्षेत्र में बुलडोजर कार्रवाई और उसके बाद हुई पुलिस फायरिंग ने सरकार की आलोचना को और बढ़ा दिया।
1977 का चुनाव और जनता का फैसला
जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की। इसके बाद राजनीतिक बंदियों को रिहा किया गया और चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई।मार्च 1977 में हुए आम चुनाव में जनता ने आपातकाल के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। कांग्रेस को कई राज्यों में भारी नुकसान हुआ और पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बने और 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हो गया।
भारतीय लोकतंत्र के लिए क्या सबक छोड़ गया आपातकाल?
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जो सत्ता, संविधान और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन की अहमियत को याद दिलाता है। यह दौर बताता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा किसी भी लोकतंत्र के लिए कितनी जरूरी है।51 वर्ष बाद भी 25 जून 1975 की वह रात भारतीय राजनीति और लोकतंत्र की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल है। 25 जून 1975 को लागू किया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। 21 महीनों तक चले इस दौर ने देश की राजनीति, न्यायपालिका, मीडिया और आम नागरिकों पर गहरा प्रभाव डाला। 1977 के चुनावों में जनता के फैसले ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के हाथ में ही होती है।