अमेरिका-इजरायल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद भारत के कई हिस्सों में शिया समुदाय ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। इन प्रदर्शनों का सबसे व्यापक असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है, जहां लखनऊ समेत कई शहरों में शोक और आक्रोश का माहौल है।
यूपी में क्यों दिख रहा सबसे ज्यादा असर?
भारत में शिया मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश में निवास करता है। लखनऊ, जौनपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, अमरोहा और बाराबंकी जैसे शहरों में बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग रहते हैं। खामेनेई को दुनिया भर के शिया मुसलमान धार्मिक मार्गदर्शक के रूप में देखते थे। ऐसे में उनकी मौत की खबर ने भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा की है। कई स्थानों पर लोगों ने काले कपड़े पहनकर मातम किया, काले झंडे लगाए और मजलिसों का आयोजन किया। ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े पदाधिकारियों ने तीन दिवसीय शोक की घोषणा की है। समुदाय के कई उलेमाओं ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर घटना बताया है।
लखनऊ में हालात और विरोध प्रदर्शन:
राजधानी लखनऊ के चौक इलाके में लगातार सभाएं और विरोध मार्च निकाले गए। शहर के ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों छोटा इमामबाड़ा और बड़ा इमामबाड़ा में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। कुछ दिनों के लिए इन स्थलों को पर्यटकों के लिए बंद रखने का निर्णय भी लिया गया। पुराने लखनऊ के कई बाजारों में व्यापारियों ने स्वेच्छा से दुकानें बंद रखीं। शोक सभाओं (मजलिस) में हजारों लोगों ने हिस्सा लिया।
लखनऊ को ‘मिनी ईरान’ क्यों कहा जाता है?
लखनऊ को अक्सर ‘मिनी ईरान’ या ‘शिराज-ए-हिंद’ कहा जाता है। इसके पीछे कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारण हैं:
1. नवाबी दौर और ईरानी मूल: अवध के पहले नवाब सादत अली खान (बुरहान-उल-मुल्क) का संबंध ईरान के निशापुर से था। उनके साथ ईरानी संस्कृति, फारसी भाषा, पोशाक और कला भी लखनऊ आई।
2. वास्तुकला में ईरानी प्रभाव: लखनऊ के इमामबाड़ों और अन्य ऐतिहासिक इमारतों की बनावट में ईरानी शैली की झलक मिलती है। खासकर मुहर्रम के दौरान शहर का माहौल ईरान के धार्मिक शहरों जैसा दिखाई देता है।
3. अजादारी और धार्मिक परंपराएं: मुहर्रम की अजादारी, ताजिया और मातमी जुलूस सीधे तौर पर ईरानी शिया परंपराओं से प्रेरित माने जाते हैं। लखनऊ में इन आयोजनों का पैमाना देश में सबसे बड़ा है।
4. शिक्षा और धार्मिक संबंध: यूपी के कई छात्र धार्मिक शिक्षा के लिए ईरान जाते रहे हैं। दोनों क्षेत्रों के बीच आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संवाद लंबे समय से कायम है।
सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव:
लखनऊ की तहजीब, शायरी और खानपान में भी ईरानी प्रभाव दिखाई देता है। फारसी भाषा का ऐतिहासिक उपयोग, नवाबी दौर की नफासत और धार्मिक परंपराएं शहर को विशिष्ट पहचान देती हैं। यही कारण है कि किसी भी बड़े धार्मिक घटनाक्रम का असर यहां अधिक गहराई से महसूस किया जाता है। अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश में हो रहे विरोध प्रदर्शन केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का परिणाम हैं। लखनऊ का ‘मिनी ईरान’ कहलाना केवल एक उपनाम नहीं, बल्कि सदियों पुराने रिश्तों और परंपराओं की पहचान है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर दिखाया है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाएं स्थानीय समाज पर किस तरह भावनात्मक और सामाजिक प्रभाव डालती हैं।