हेमंत गोस्वामी, निवाड़ी: निवाड़ी जिले की धार्मिक नगरी ओरछा में चल रही सप्त दिवसीय कथा के दौरान प्रख्यात संत राजेंद्र दास महाराज ने मीडिया से चर्चा की। उन्होंने दोटूक शब्दों में संदेश देते हुए कहा कि गाय को केवल धार्मिक आस्था या खसरा-खतौनी के चश्मे से देखना बंद करना होगा। गोवंश भारत के राष्ट्र निर्माण, जन-स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था की सबसे मजबूत रीढ़ है। संत ने गोवध जैसे मामलों पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रशासन और पुलिस से सख्त कानूनी कमान कसने और समाज में जागरूकता बढ़ाने का आह्वान किया।
15 हजार गोवंश का संरक्षण
संत ने बताया कि उनके आश्रम में वर्तमान में करीब 15,000 गोवंश की सेवा व्यवस्थित रूप से की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि वैश्विक महामारी कोरोना काल के दौरान उनकी गौशाला परिसर में रहने वाला कोई भी सेवादार या व्यक्ति संक्रमित नहीं हुआ। इसी अनुभव के आधार पर अब वहां प्रवेश से पहले गौमूत्र अमृत अर्क के सेवन की अनूठी परंपरा शुरू की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि कई नागरिक बिना किसी आधुनिक वैक्सीन के, केवल पारंपरिक दिनचर्या के सहारे पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
जनसंख्या संतुलन और राजनीतिक पर
मंच से संत ने देश के जनसांख्यिकीय और राजनीतिक पर भी अपनी बात रखी। संत ने कहा कि देश में हिंदू आबादी अभी भी पूर्ण बहुमत में है, लेकिन विभिन्न वर्गों के बीच जनसंख्या वृद्धि दर का असंतुलन भविष्य के लिए चिंता का विषय है। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों का उदाहरण दिया और कहा कि किसी भी क्षेत्र में एक संगठित समाज का प्रभाव वहां के चुनावी परिणामों को बदलने की क्षमता रखता है।
खाद के खिलाफ सब्सिडी की मांग
कृषि और किसानों की आर्थिक स्थिति पर महाराज ने कहा कि पहले की खेती पूरी तरह गौ-आधारित होती थी, जहां खाद से लेकर बैल तक सब घर का होता था, जिससे किसान पर कोई कर्ज नहीं चढ़ता था। लेकिन आज रासायनिक खाद, महंगे बीज, डीजल और मशीनों के कारण किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है। संत ने सरकार से मांग की है कि जो किसान स्वेच्छा से गौ-आधारित प्राकृतिक खेती को अपनाते हैं, उन्हें शासन स्तर पर विशेष सब्सिडी और प्रोत्साहन राशि बैंक खातों में दी जानी चाहिए।
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