छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में वैदिक मंत्रोच्चार को अनिवार्य किए जाने के फैसले को लेकर राज्य में बहस तेज हो गई है। एक ओर राज्य सरकार इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़ा कदम बता रही है, वहीं कांग्रेस और मसीह समाज ने इस निर्णय पर आपत्ति जताते हुए इसे सभी समुदायों की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा बताया है।
कांग्रेस ने शिक्षा के राजनीतिकरण का लगाया आरोप
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकारी स्कूलों का उद्देश्य विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है, न कि किसी विशेष धार्मिक परंपरा को बढ़ावा देना। पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेंद्र साहू ने कहा कि ऐसे फैसलों से शैक्षणिक संस्थानों का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है और समाज में अनावश्यक विवाद पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है।
ईसाई समाज ने मांगी विशेष छूट
क्रिश्चियन वेलफेयर सोसायटी ने भी इस निर्णय पर सवाल खड़े किए हैं। संस्था के अध्यक्ष क्रिस्टोफर पॉल ने कहा कि ईसाई समुदाय के विद्यार्थियों और शिक्षकों को वैदिक मंत्रोच्चार से मुक्त रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस मांग पर विचार नहीं करती है तो मामले को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
शिक्षा जगत में भी उठ रही चिंताएं
कुछ शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि स्कूलों में धार्मिक गतिविधियों को अनिवार्य बनाए जाने से विभिन्न समुदायों के बीच असहजता की स्थिति बन सकती है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को विवादों से दूर रखते हुए सभी वर्गों के लिए समान और समावेशी माहौल बनाए रखना आवश्यक है।
सरकार बोली- संस्कृति से जुड़ा है निर्णय
राज्य सरकार ने विपक्ष और अन्य संगठनों की आपत्तियों को खारिज करते हुए फैसले का बचाव किया है। कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि वैदिक मंत्र भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से परिचित कराना गलत नहीं है। साथ ही उन्होंने विपक्ष पर इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया।