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MP Politics: आखिर, कमलनाथ नहीं जीत पाए नेतृत्व का भरोसा....

MP Politics: आखिर, कमलनाथ नहीं जीत पाए नेतृत्व का भरोसा....

दिनेश निगम ‘त्यागी’: तेरासी वर्ष के मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उन्हें फिर राज्यसभा का प्रत्याशी घोषित किया गया है लेकिन 79 वर्ष के कमलनाथ मार्गदर्शक मंडल में जाते दिख रहे हैं। राज्यसभा का टिकट हािसल करने के लिए उन्होंने भरपूर कोशिश की। दावेदारों में उन्हें सबसे आगे बताया गया। यह भी कहा गया कि कमलनाथ का नाम लगभग तय है लेकिन वे पार्टी आलाकमान का भरोसा नहीं जीत पाए। कभी वे गांधी परिवार के सबसे नजदीक हुआ करते थे। उन्हें मैनेजमेंट का महारथी माना जाता था। अब दोनों मसलों पर उनकी साख खत्म है। कमलनाथ के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस टूट गई और उनके हाथ से सत्ता भी चली गई। तब से उनकी मैनेजमेंट क्षमता पर सवाल खड़े हो गए।

इसके बाद उनके नेतृत्व में कांग्रेस विधानसभा चुनाव हार गई जबकि प्रदेश भर में उन्हे भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रचारित किया गया था। लिहाजा, नेतृत्व कमलनाथ से इतना नाराज हो गया कि भरोसे में लिए बिना ही उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया। लोकसभा चुनाव के दौरान नाराज कमलनाथ भाजपा में जाते-जाते रह गए। इन अटकलों के बाद उन्होंने कांग्रेस हाईकमान का भरोसा पूरी तरह खो गया। यही कारण है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी से कई मुलाकातों के बावजूद अब तक न उन्हें संगठन में कोई जवाबदारी मिली और न ही वे राज्यसभा प्रत्याशी बन पाए।

रजनीश का चयन कर भाजपा नेतृत्व ने फिर चौंकाया....

पहले मुख्यमंत्री पद के लिए डॉ मोहन यादव, इसके बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद पर हेमंत खंडेलवाल का चयन कर भाजपा नेतृत्व ने जिस तरह चौंकाया था, राज्यसभा के लिए रजनीश अग्रवाल का चयन इससे भी ज्यादा हैरान करने वाला है। राज्यसभा की एक सीट प्रदेश और दूसरी केंद्र के कोटे में जाएगी, यह पहले से तय था लेकिन पहली सीट के लिए रजनीश का चयन होगा, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

पार्टी के बड़े दिग्गज कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, अरविंद भदौरिया, सुरेश पचौरी, लाल सिंह आर्य, कांतिदेव सिंह आदि राज्यसभा जाने के लिए कतार में थे। सभी अपने-अपने स्तर पर लाबिंग कर रहे थे लेकिन नेतृत्व ने भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता रजनीश को चुना, जो बिना किसी उम्मीद के सालों से संगठन का काम करते आ रहे थे। संभवत: उन्होंने राज्यसभा जाने के बारे में सोचा भी नहीं होगा। वे चूंकि संगठन के काम में ही लगे रहते थे इसलिए वे महामंत्री, उपाध्यक्ष बनने की ख्वाहिश जरूर रखते होंगे। हेमंत खंडेलवाल की टीम में उन्हें एक बार फिर सचिव पद की जवाबदारी मिली, इसकी वजह से उनके अंदर निराशा का भाव जरूर आया होगा। पर पार्टी नेतृत्व ने राज्यसभा के लिए उनका नाम तय कर बता दिया कि भाजपा के अंदर अब भी पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की पूछपरख है।

कांग्रेस की मीनाक्षी का चयन भाजपा के रजनीश जैसा....!

कांग्रेस नेतृत्व ने राज्यसभा के लिए मीनाक्षी नटराजन का चयन कर कमलनाथ के साथ दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओंं की मंशा पर पानी फेर दिया है। कांग्रेस ने पहले जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष और उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष का दायित्व सौंप कर प्रदेश की कमान अपेक्षाकृत नए नेतृत्व के हाथ सौंपी। अब मीनाक्षी का चुनाव उसी दिशा में बढ़ाया गया एक और कदम है। राज्यसभा के लिए मीनाक्षी का चयन बुरा नहीं है। वे एनएसयूआई और युकां की प्रदेश अयध्यक्ष के साथ मंदसौर लोकसभा सीट से सांसद रही हैं। राहुल गांधी की कोर टीम की भरोसेमंद सदस्य हैं और हमेशा कांग्रेस के अंदर जमीनी स्तर के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय रहती हैं।

उन्हें तेलंगाना प्रदेश के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस की ओर से प्रभारी नियुक्त किया गया था। उनकी गिनती अच्छे वक्ता के तौर पर भी होती है। साफ है कि राहुल ने अपनी करीबी और संगठनात्मक कार्यों के लिए समर्पित नेता को प्राथमिकता दी है। इस नाते इस चयन काे भाजपा के रजनीश अग्रवाल जैसा माना जा सकता है। भाजपा की तरह कांग्रेस में भी कमलनाथ, दिग्विजय, सज्जन सिंह वर्मा, अरुण यादव, जीतू पटवारी, कमलेश्वर पटेल जैसे दिग्गज इंतजार करते रह गए और मीनाक्षी बाजी मार ले गईं। कांग्रेस को इस चयन का फायदा युवाओं को पार्टी से जोड़ने में मिल सकता है।

अंतत: भाजपा ने कर दी मीनाक्षी की राह कठिन....

भाजपा ने पहले राज्यसभा के लिए दो ही प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। इसलिए कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन चैन की सांस ले रही थीं। सदस्य संख्या के लिहाज से भाजपा दो प्रत्याशियों को ही जिता सकती है। लेकिन पार्टी ने ऐनवक्त पर महेश केवट को तीसरे प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतार िदया। इससे मीनाक्षी की राह कठिन हो गई। जीत के लिए कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या है। इस कारण कोई खतरा दिखाई नहीं पड़ता। निर्मला सप्रे को छोड़ दें तो कहीं से बगावत की कोई खबर भी नहीं है। फिर भी भाजपा का आपरेशन लोटस कई बार कमाल कर जाता है। राज्य सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा भी है कि यदि नेतृत्व ने तीसरा उम्मीदवार दिया तो उसे जिताने की पूरी कोशिश करेंगे। उनके साथ पूरी सरकार और संगठन तीसरे प्रत्याशी को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंकेगा।

पर भाजपा का खतरा अपनी जगह है, लेकिन कांग्रेस में दिग्विजय समर्थक एक नेता नरेश ज्ञानचंदानी ने मीनाक्षी की राह में कांटे बिछाना शुरू कर दिए हैं। उन्होंने हाईकमान को पत्र लिख कर कहा है कि सिर्फ दिग्विजय ही कांग्रेस को टूटने से बचा सकते हैं इसलिए उन्हें ही राज्यसभा का प्रत्याशी घोषित किया जाए। बता दें, ज्ञानचंदानी खुद विधायक नहीं हैं। वे भूल गए हैं कि दिग्विजय अपने बिसाहूलाल सिंह जैसे समर्थक तक को टूटने से नहीं रोक पाए थे और कांग्रेस सरकार गिर गई थी। वे क्या कांग्रेस को टूटने से बचाएंगे?

ग्रह नक्षत्र नहीं दे रहे भाजपा के इस दिग्गज का साथ....

प्रदेश भाजपा के एक दिग्गज पूर्व ग्रह मंत्री नरोत्तम मिश्रा राजनीति की मुख्य धारा में आने के लिए कई तरह के पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजन करा चुके हैं पर लगता है कि ग्रह नक्षत्र उनसे रूठे हुए हैं, साथ नहीं दे रहे। विधानसभा चुनाव हारने के बाद उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट भले नहीं मिला लेकिन उनकी सक्रियता में कोई कमी नहीं रही। उन्हें भाजपा की न्यू ज्वाइनिंग कमेटी का संयोजक बनाया गया और उनके नेतृत्व में कांग्रेस के लाखाें नेता, कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर भाजपा में आ गए। देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले चुनाव में उन्हें प्रचार के लिए भेजा गया।

इस परीक्षा में भी वे पास रहे। फिर भी पार्टी नेतृत्व की नजरें उन पर नियायत नहीं हो रहीं। पहले मुख्य दावेदार होने के बाद भी नरोत्तम भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नहीं बन पाए। इसके बाद उन्हें राज्यसभा के टिकट की उम्मीद थी, लेकिन पार्टी ने संगठन में निष्ठा से मुस्तैद रहने वाले रजनीश अग्रवाल के नाम पर मुहर लगा दी। दतिया से कांग्रेस के राजेंद्र भारती का चुनाव शून्य घोषित होने के बाद नरोत्तम की उम्मीद फिर जागी। उन्होंने दतिया से उप चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। पर यहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया। निर्वाचन आयोग ने कई राज्यों के उप चुनावों की घोषणा की लेकिन दतिया काे छोड़ दिया। नरोत्तम फिर मन मसोस कर रहे गए। देखिए, ग्रह नक्षत्र कब उनका साथ देते हैं और देते भी हैं या नहीं?


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