बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वन विभाग के वनरक्षकों की वरिष्ठता को लेकर अहम फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिविजन बेंच ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी का तबादला प्रशासनिक आधार पर एक वनवृत्त से दूसरे वनवृत्त में किया जाता है, तो केवल इस वजह से भर्ती के समय मिली उसकी वरिष्ठता खत्म नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने वन विभाग के 31 जुलाई 2014 के सर्कुलर के क्लॉज-5 को संबंधित सीमा तक मनमाना और वैधानिक नियमों के विपरीत मानते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान उन वनरक्षकों पर लागू नहीं किया जा सकता, जिनकी नियुक्ति सीधी भर्ती से हुई थी और बाद में उन्हें प्रशासनिक कारणों से दूसरे वनवृत्त में भेजा गया।
तबादले के बाद वरिष्ठता में किया गया था बदलाव
मामला उन वनरक्षकों से संबंधित है, जिनकी नियुक्ति 5 जनवरी 2013 को छत्तीसगढ़ क्लास-III फॉरेस्ट सर्विस रिक्रूटमेंट रूल्स, 2012 के तहत हुई थी। नियुक्ति के बाद उन्हें गरियाबंद वनमंडल में पदस्थ किया गया था।
बाद में प्रशासनिक आधार पर कुछ वनरक्षकों का तबादला बिलासपुर, मुंगेली और कोरबा क्षेत्र में किया गया। नई जगह पदस्थापना के बाद विभागीय वरिष्ठता सूची में उनके नाम नीचे कर दिए गए।
1 सितंबर 2025 को जारी ग्रेडेशन लिस्ट में कुछ कर्मचारियों के नाम के सामने ‘अन्य वृत्त से स्थानांतरण’ का उल्लेख किया गया था। इसके चलते उन्हें नए वनवृत्त में पहले से कार्यरत कर्मचारियों के मुकाबले कम वरिष्ठता दी गई।
कर्मचारियों ने वरिष्ठता घटाने को हाईकोर्ट में दी चुनौती
याचिकाकर्ता वनरक्षकों ने अदालत में तर्क दिया कि उनकी नियुक्ति सीधी भर्ती और मेरिट के आधार पर हुई थी। भर्ती के समय प्राप्त उनके अंकों का भी सक्षम स्तर पर सत्यापन किया जा चुका था।
ऐसे में बाद में प्रशासनिक आधार पर किए गए तबादले को उनकी मूल वरिष्ठता खत्म करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
दूसरी ओर, वन विभाग ने 31 जुलाई 2014 के सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा कि एक वनवृत्त से दूसरे वनवृत्त में स्थानांतरण होने पर कर्मचारी की वरिष्ठता नए वृत्त में पहले से कार्यरत सीधी भर्ती और पदोन्नत कर्मचारियों के नीचे तय की जानी चाहिए।
वरिष्ठता कर्मचारी का अहम सेवा अधिकार: हाईकोर्ट
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने वरिष्ठता को कर्मचारी का महत्वपूर्ण सेवा अधिकार माना। अदालत ने कहा कि वरिष्ठता का सीधा असर पदोन्नति और अन्य सेवा लाभों पर पड़ता है।
कोर्ट ने यह भी माना कि प्रशासनिक या जनहित में किया गया तबादला कर्मचारी की स्वैच्छिक पसंद नहीं होता। इसलिए प्रशासनिक आदेश का पालन करते हुए दूसरी जगह जाने वाले कर्मचारी को उसकी पहले से अर्जित वरिष्ठता से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि 1961 के नियमों का नियम 12(2)(बी) उन मामलों में लागू होता है, जहां स्थानांतरण स्वयं भर्ती का माध्यम हो। मौजूदा मामले में वनरक्षकों की नियुक्ति सीधी भर्ती के जरिए हुई थी, इसलिए उस प्रावधान को इन कर्मचारियों की वरिष्ठता खत्म करने के लिए लागू नहीं किया जा सकता।
90 दिन में फिर से तय करनी होगी वरिष्ठता
हाईकोर्ट ने वन विभाग को याचिकाकर्ताओं की वरिष्ठता के दावे पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। विभाग को 31 जुलाई 2014 के सर्कुलर के क्लॉज-5 को नजरअंदाज करते हुए भर्ती के समय प्राप्त मेरिट और लागू वैधानिक नियमों के आधार पर वरिष्ठता तय करनी होगी।
अदालत ने यह प्रक्रिया प्रमाणित आदेश की प्रति मिलने के 90 दिनों के भीतर पूरी करने को कहा है। इसके साथ ही 25 सितंबर 2025 को याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन खारिज करने की कार्रवाई को भी रद्द कर दिया गया है।
दूसरे कर्मचारियों की वरिष्ठता पर तत्काल असर नहीं
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैसले का असर वर्तमान वरिष्ठता सूची में शामिल उन कर्मचारियों पर स्वतः नहीं पड़ेगा, जो इन याचिकाओं में पक्षकार नहीं हैं। यदि भविष्य में उनकी वरिष्ठता प्रभावित होने की स्थिति बनती है तो उन्हें सुनवाई का अवसर देने के बाद ही संबंधित कार्रवाई की जा सकेगी।