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तराजू सत्यापन के नाम पर वसूली का आरोप, कहीं ₹1500 तो कहीं ₹5000 तक लिए पैसे; रसीद को लेकर भी विवाद

तराजू सत्यापन के नाम पर वसूली का आरोप, कहीं ₹1500 तो कहीं ₹5000 तक लिए पैसे; रसीद को लेकर भी विवाद

डोंगरगढ़//  राजा शर्मा: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में सरकारी राशन दुकानों के इलेक्ट्रॉनिक तराजू के सत्यापन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। नापतौल विभाग द्वारा आयोजित सत्यापन शिविर में राशन दुकान संचालकों से निर्धारित शुल्क से अधिक राशि वसूलने के आरोप लगे हैं। संचालकों का दावा है कि किसी से 1500 रुपये तो किसी से 5000 रुपये तक लिए गए, लेकिन भुगतान के बदले विधिवत रसीद नहीं दी गई। अब इस पूरे मामले में खाद्य विभाग और नापतौल विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

सत्यापन शिविर में शुल्क वसूली पर उठे सवाल

दरअसल, डोंगरगढ़ विकासखंड में शासकीय उचित मूल्य की दुकानों में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक तराजू की जांच और सत्यापन के लिए एक दिवसीय शिविर लगाया गया था। इसमें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के राशन दुकान संचालक अपने तराजू का सत्यापन कराने पहुंचे थे।

शिविर में प्रक्रिया पूरी कराने के दौरान भुगतान को लेकर विवाद सामने आया। राशन दुकान संचालकों का आरोप है कि हर साल आयोजित होने वाले इस शिविर में प्रति दुकान 1500 रुपये अग्रिम जमा कराए जाते हैं। बताया जा रहा है कि खाद्य विभाग द्वारा चयनित व्यक्ति संचालकों से राशि एकत्रित कर ऑनलाइन चालान के माध्यम से शासन के खाते में जमा करता है।

लेकिन संचालकों का सवाल है कि जब भुगतान सरकारी खाते में किया जा रहा है, तो प्रत्येक दुकानदार को इसकी आधिकारिक रसीद क्यों नहीं मिल रही है?

दो साल से रसीद नहीं मिलने का आरोप

राशन दुकान संचालकों का कहना है कि पिछले दो वर्षों से सत्यापन के नाम पर पैसे तो जमा कराए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें भुगतान का विधिवत प्रमाण नहीं दिया जा रहा। कुछ संचालकों को रसीद दिए जाने की बात सामने आई है, जबकि कई लोग अब भी अपनी जमा राशि की रसीद के लिए परेशान हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों से शिविर में पहुंचे कुछ संचालकों ने आरोप लगाया कि अलग-अलग दुकानों से 1500 रुपये से लेकर 5000 रुपये तक वसूले गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि तराजू सत्यापन का वास्तविक सरकारी शुल्क कितना निर्धारित है? यदि निर्धारित शुल्क से अधिक राशि ली गई है, तो अतिरिक्त पैसे किस मद में जमा किए गए और उनका हिसाब कौन देगा?

अधिकारियों की गैरमौजूदगी में शिविर चलाने का आरोप

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल नापतौल विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर उठ रहे हैं। राशन दुकान संचालकों का आरोप है कि इतने बड़े स्तर पर शिविर आयोजित होने के बावजूद विभाग का कोई अधिकृत अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं रहता। पूरी प्रक्रिया कंप्यूटर ऑपरेटर और मैकेनिक के भरोसे संचालित होने की बात कही जा रही है।

वहीं खाद्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और निगरानी को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि शहरी क्षेत्र के कुछ राशन दुकान संचालक ही शिविर में समन्वय बनाने और दूसरे संचालकों से राशि एकत्रित करने का काम करते हैं।

यदि यह पूरी प्रक्रिया विभागीय व्यवस्था के तहत संचालित हो रही है, तो अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं की जा रही? और यदि कोई अनियमितता हुई है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

सरकारी राशन व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल

गौरतलब है कि शासकीय उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से गरीब और जरूरतमंद परिवारों तक राशन पहुंचाया जाता है। इन दुकानों में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक तराजू का सही माप देना बेहद जरूरी है। इसी उद्देश्य से समय-समय पर उनका सत्यापन किया जाता है।

ऐसे में सत्यापन जैसी जरूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना विभाग की जिम्मेदारी है। यदि संचालकों द्वारा लगाए गए मनमानी वसूली और रसीद नहीं देने के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह गंभीर मामला हो सकता है।

फिलहाल राशन दुकान संचालकों के आरोपों ने डोंगरगढ़ में खाद्य विभाग और नापतौल विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में जांच के आदेश देता है या नहीं। साथ ही यह भी देखना होगा कि संचालकों से जमा कराई गई राशि का पूरा हिसाब सार्वजनिक कर उन्हें भुगतान की आधिकारिक रसीद उपलब्ध कराई जाती है या नहीं।


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