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36 साल की नौकरी, 300 रुपये से शुरुआत और रिटायरमेंट के बाद भी नहीं थमा ज्ञान बांटने का जुनून, बंशीपद बने मिसाल

36 साल की नौकरी, 300 रुपये से शुरुआत और रिटायरमेंट के बाद भी नहीं थमा ज्ञान बांटने का जुनून, बंशीपद बने मिसाल

पखांजूर। सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद अधिकांश लोग परिवार और निजी जिंदगी को समय देना पसंद करते हैं, लेकिन पखांजूर क्षेत्र के शिक्षक बंशीपद देवनाथ ने सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षा को ही अपने जीवन का उद्देश्य बनाए रखा है। शिक्षा विभाग में करीब 36 वर्षों तक सेवाएं देने के बाद वर्ष 2022 में सेवानिवृत्त हुए बंशीपद देवनाथ आज भी स्कूल पहुंचकर बच्चों को नि:शुल्क पढ़ा रहे हैं।

उनके लिए पढ़ाना महज नौकरी नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे नियमित रूप से बच्चों के बीच पहुंचते हैं और अपने वर्षों के अनुभव व ज्ञान को उनके साथ साझा करते हैं। खास बात यह है कि इसके बदले वे किसी तरह का आर्थिक लाभ नहीं लेते।

1985 में शुरू हुआ था शिक्षक बनने का सफर

बंशीपद देवनाथ ने वर्ष 1985 में मिनी पीपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। नौकरी के शुरुआती दिनों में उनका वेतन केवल 300 रुपये प्रतिमाह था। उस दौर में सीमित संसाधनों और सुविधाओं के बावजूद उन्होंने शिक्षण कार्य के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। लगभग साढ़े तीन दशक के सेवाकाल के दौरान उन्होंने पखांजूर क्षेत्र के कई विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाया। पीवी-02 देवपुर, पीवी-38 और पीवी-131 समेत विभिन्न स्कूलों में उन्होंने शिक्षक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई और विद्यार्थियों के भविष्य को बेहतर बनाने में योगदान दिया।

शिक्षक की जिम्मेदारी स्कूल तक सीमित नहीं

बंशीपद देवनाथ का मानना है कि शिक्षक का काम केवल निर्धारित समय में कक्षा लेने तक सीमित नहीं होना चाहिए। एक शिक्षक समाज को ऐसे नागरिक देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ संस्कारवान और जागरूक भी हों। इसी सोच ने उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षा से जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया। उनके लिए बच्चों को पढ़ाना आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सरकारी सेवा के दौरान था।

2022 में रिटायरमेंट के बाद भी जारी रखी पढ़ाई

30 सितंबर 2022 को पीवी-131 प्राथमिक शाला में प्रधान पाठक के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद बंशीपद देवनाथ के सामने आराम से जीवन बिताने का विकल्प था। हालांकि, उन्होंने इसके बजाय बच्चों के बीच रहकर उन्हें पढ़ाने का फैसला किया। जानकारी के अनुसार, सेवानिवृत्ति के बाद से वर्ष 2022 से वे पखांजूर क्षेत्र के अलग-अलग स्कूलों में बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं। उनका उद्देश्य बच्चों को अपने अनुभव का लाभ देना और उनकी पढ़ाई में हर संभव सहयोग करना है।

बिना किसी स्वार्थ के बांट रहे ज्ञान

बंशीपद देवनाथ का यह प्रयास इसलिए भी खास है क्योंकि वे बच्चों को पढ़ाने के बदले किसी आर्थिक लाभ की अपेक्षा नहीं रखते। उनका मानना है कि एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि तब होती है, जब उसके पढ़ाए बच्चे आगे बढ़ते हैं और अपने जीवन में सफलता हासिल करते हैं।

आज जब सेवानिवृत्ति के बाद ज्यादातर लोग नौकरी की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर आराम करना चाहते हैं, ऐसे समय में बंशीपद देवनाथ का बच्चों के लिए लगातार काम करना एक अलग मिसाल पेश करता है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि शिक्षा और ज्ञान बांटने की कोई उम्र नहीं होती। सरकारी सेवा खत्म होने के बाद भी समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाई जा सकती है। बंशीपद देवनाथ अपने काम के जरिए नई पीढ़ी को न सिर्फ शिक्षा दे रहे हैं, बल्कि सेवा, समर्पण और सामाजिक जिम्मेदारी की प्रेरणा भी दे रहे हैं।
 


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