राजा शर्मा //डोंगरगढ़: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित मां बमलेश्वरी धाम धार्मिक आस्था, प्राचीन लोकमान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख केंद्र है। पहाड़ की चोटी पर विराजमान बड़ी मां के दर्शन के लिए श्रद्धालु करीब 1100 सीढ़ियां चढ़ते हैं। नवरात्र में यहां मनोकामना ज्योत, पंचमी भेंट और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से भक्ति का विशेष माहौल देखने को मिलता है। डोंगरगढ़, राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ की धार्मिक पहचान में डोंगरगढ़ स्थित मां बमलेश्वरी धाम का विशेष स्थान है। पहाड़ की ऊंचाई पर स्थित माता का मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रतीक है। यहां दर्शन के लिए आने वाले भक्त मां से सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर से लेकर पहाड़ी मार्ग तक भक्तिमय वातावरण दिखाई देता है। मां बमलेश्वरी धाम की खासियत इसकी धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ यहां की पारंपरिक पूजा-पद्धतियां भी हैं। बड़ी मां और छोटी मां के दो प्रमुख मंदिर, मनोकामना ज्योत की परंपरा, रोपवे की सुविधा और आदिवासी समाज की सहभागिता इस धार्मिक स्थल को विशिष्ट पहचान देती है।
पहाड़ की चोटी पर बड़ी मां, नीचे छोटी मां का मंदिर
राजनांदगांव जिले का डोंगरगढ़ नगर मां बमलेश्वरी मंदिर के कारण देशभर में जाना जाता है। यहां पहाड़ की चोटी पर बड़ी मां बमलेश्वरी का मंदिर स्थित है, जबकि नीचे छोटी मां बमलेश्वरी का मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए प्रमुख केंद्र है। माता के दर्शन के लिए सालभर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से बढ़ जाती है। इन अवसरों पर मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और माता के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। डोंगरगढ़ सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है। पहाड़ी मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों के अलावा रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है। इससे बुजुर्गों और सीढ़ियां चढ़ने में परेशानी महसूस करने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचने का एक वैकल्पिक साधन मिलता है।
राजा विक्रमादित्य से जुड़ी है लोकमान्यता
मां बमलेश्वरी धाम से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं स्थानीय जनश्रुतियों में प्रचलित हैं। इनमें एक मान्यता राजा विक्रमादित्य से भी जुड़ी है। लोककथाओं के अनुसार, राजा विक्रमादित्य की तपस्या से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें दर्शन दिए थे। इस कथा को धार्मिक परंपरा और लोकविश्वास के रूप में देखा जाता है। इसके ऐतिहासिक पक्ष की पुष्टि के लिए प्रमाणित ऐतिहासिक स्रोतों की आवश्यकता है। हालांकि, श्रद्धालुओं के बीच इस मान्यता का विशेष महत्व बना हुआ है। समय के साथ डोंगरगढ़ का यह मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया है। यहां आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन के साथ अपनी पारिवारिक और व्यक्तिगत मनोकामनाएं भी अर्पित करते हैं।
मनोकामना ज्योत: आस्था और विश्वास की परंपरा
मां बमलेश्वरी धाम में नवरात्र के दौरान मनोकामना ज्योत प्रज्वलित करने की परंपरा विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार माता के दरबार में ज्योत प्रज्वलित करवाते हैं और नौ दिनों तक देवी की आराधना करते हैं। हर ज्योत के साथ भक्तों की कोई न कोई प्रार्थना जुड़ी होती है। कोई परिवार की खुशहाली की कामना करता है, तो कोई जीवन में सुख-शांति और सफलता के लिए माता से आशीर्वाद मांगता है। नवरात्र की शुरुआत में प्रज्वलित की जाने वाली ज्योतियों का नवमी के दिन विसर्जन किया जाता है। इस दौरान श्रद्धालु धार्मिक परंपरा के अनुसार ज्योत कलशों को लेकर निर्धारित विसर्जन स्थल तक पहुंचते हैं। यह आयोजन भक्तों के लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। मंदिर ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल के अनुसार, नवमी के अवसर पर 901 ज्योति कलशों के विसर्जन की परंपरा आयोजन का प्रमुख हिस्सा है। इस आयोजन को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान मिलने का भी उल्लेख किया जाता है। हालांकि, संबंधित रिकॉर्ड की आधिकारिक प्रविष्टि और श्रेणी की पुष्टि आवश्यक है।
1100 सीढ़ियों की चढ़ाई और रोपवे की सुविधा
पहाड़ की चोटी पर स्थित बड़ी मां के मंदिर तक पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और संकल्प से जुड़ा अनुभव है। मंदिर तक जाने के लिए लगभग 1100 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। रास्ते में माता के जयकारे लगाते हुए भक्त दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं। जो श्रद्धालु पैदल चढ़ाई नहीं करना चाहते या जिनके लिए सीढ़ियां चढ़ना कठिन है, वे रोपवे का विकल्प चुन सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाला यह सफर आसपास के प्राकृतिक दृश्यों को देखने का अवसर भी देता है। मंदिर ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल के मुताबिक, रोपवे की तकनीकी व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए पिछले लगभग छह महीनों में करीब 1.25 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या को देखते हुए रोपवे का सुरक्षित संचालन, नियमित रखरखाव और यात्रियों की सुविधाएं महत्वपूर्ण हैं। नवरात्र जैसे बड़े आयोजनों के दौरान मंदिर प्रबंधन के लिए भीड़ का व्यवस्थित संचालन और श्रद्धालुओं की सुरक्षा विशेष प्राथमिकता रहती है।
पंचमी भेंट में दिखता है सनातन परंपरा और आदिवासी संस्कृति का संगम
मां बमलेश्वरी धाम की एक प्रमुख विशेषता यहां दिखाई देने वाला सांस्कृतिक समन्वय है। नवरात्र के दौरान आयोजित पंचमी भेंट में आदिवासी समाज की पारंपरिक धार्मिक परंपराओं की झलक देखने को मिलती है। इस अवसर पर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों से बैगा समुदाय के लोग माता के दरबार में पहुंचते हैं। राज बैगा के नेतृत्व में आने वाले श्रद्धालु पारंपरिक पूजा-पद्धति और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ आयोजन में भाग लेते हैं। इस परंपरा में आंगा देव और मां बमलेश्वरी के मिलन को धार्मिक महत्व दिया जाता है। पारंपरिक वेशभूषा, लोकविश्वास और सामूहिक पूजा इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं। पंचमी भेंट छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता और लोकपरंपराओं को समझने का अवसर भी प्रदान करती है। इस दौरान अलग-अलग धार्मिक परंपराओं से जुड़े लोग एक ही देवी धाम में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। इससे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं की निरंतरता दिखाई देती है।
मां बमलेश्वरी को भेंट किया गया पीतल का बब्बर शेर
माता के दरबार में श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार भेंट अर्पित करते हैं। कोई पूजा-अर्चना में भाग लेता है, तो कोई मंदिर की धार्मिक गतिविधियों और व्यवस्थाओं में सहयोग करता है। इसी क्रम में एक श्रद्धालु ने मां बमलेश्वरी को पीतल से निर्मित बब्बर शेर की प्रतिमा भेंट की है। हिंदू धार्मिक परंपरा में सिंह को मां दुर्गा के वाहन और शक्ति, साहस तथा पराक्रम के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। मंदिर ट्रस्ट समिति के अनुसार, प्रतिमा को मंदिर परिसर में स्थापित करने की योजना है। स्थापना के बाद श्रद्धालुओं को माता के दरबार में इस धार्मिक प्रतीक के दर्शन करने का अवसर मिलेगा। यह भेंट मंदिर से जुड़ी आस्था और भक्तों के समर्पण की परंपरा का एक उदाहरण है।
डोंगरगढ़ का मां बमलेश्वरी धाम क्यों है खास?
मां बमलेश्वरी धाम की पहचान कई धार्मिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से मिलकर बनी है। पहाड़ की चोटी पर स्थित मंदिर, बड़ी मां और छोटी मां के अलग-अलग दरबार, लगभग 1100 सीढ़ियों की चढ़ाई, रोपवे की सुविधा और नवरात्र की विशेष परंपराएं इसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बनाती हैं। मनोकामना ज्योत और पंचमी भेंट जैसे आयोजन श्रद्धालुओं को देवी आराधना के साथ स्थानीय सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ते हैं। आदिवासी समाज की भागीदारी इस धाम की धार्मिक और सामाजिक विविधता को सामने लाती है। डोंगरगढ़ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा केवल मंदिर में दर्शन करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उन्हें क्षेत्र की लोकमान्यताओं, परंपराओं और सामूहिक आस्था को करीब से देखने का अवसर भी मिलता है। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित मां बमलेश्वरी धाम धार्मिक आस्था, लोकपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। लगभग 1100 सीढ़ियों की चढ़ाई से लेकर मनोकामना ज्योत और पंचमी भेंट तक, यहां की परंपराएं डोंगरगढ़ को विशेष पहचान देती हैं। नवरात्र के दौरान यह धाम भक्ति, श्रद्धा और सांस्कृतिक सहभागिता के अनूठे वातावरण का साक्षी बनता है।