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आस्था, इतिहास और रहस्य का संगम है कुरुद का चंडी माई मंदिर, जानिए इसकी खास बातें

आस्था, इतिहास और रहस्य का संगम है कुरुद का चंडी माई मंदिर, जानिए इसकी खास बातें

कुरुद। छत्तीसगढ़ के कुरुद स्थित चंडी माई मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का धार्मिक इतिहास करीब 1000 साल पुराना माना जाता है। नवरात्र के अवसर पर यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है। माता के दर्शन, मनोकामना ज्योत, जवारा उत्सव और पारंपरिक पूजा-अर्चना मंदिर की धार्मिक पहचान का हिस्सा हैं। वहीं, मंदिर के पूर्व दिशा में स्थित लगभग 12 फीट गहरी प्राचीन बावड़ी आज भी अपने निर्माणकाल और इतिहास को लेकर जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।

नवरात्र में नौ दिनों तक गूंजते हैं जसगीत और माता सेवा

चैत्र और क्वांर नवरात्र के दौरान कुरुद की चंडी माई मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। मंदिर परिसर को फूलों, रंग-बिरंगी रोशनी और पारंपरिक सजावट से सजाया जाता है। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ज्योत प्रज्ज्वलित करते हैं। नौ दिनों तक माता सेवा, जसगीत और विशेष पूजा-अर्चना का सिलसिला चलता है। नवरात्र के दौरान आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज से भी भक्त माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इन दिनों मंदिर परिसर में धार्मिक उत्साह और भक्ति का माहौल देखने को मिलता है।

आदिशक्ति योगमाया के स्वरूप में पूजी जाती हैं मां चंडी

स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में मां चंडी को आदिशक्ति योगमाया का स्वरूप माना जाता है। श्रद्धालु नए कार्यों की शुरुआत से पहले माता का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। नवविवाहित जोड़े सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं, जबकि दूसरे भक्त संतान सुख, कारोबार में तरक्की और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं। मंदिर के पुजारी जितेंद्र नाथ योगी के अनुसार, यहां विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। स्थानीय भक्तों का कहना है कि माता के दरबार में उन्हें मानसिक शांति और आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है। मंदिर परिसर के आसपास जलेश्वर महादेव और भैरव बाबा के देवस्थान भी स्थित हैं, जो इस क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं से जुड़े हुए हैं।

बांका बाई और बीरसिंह गोड़ से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

कुरुद की चंडी माई मंदिर से जुड़ी स्थानीय परंपराओं में कुरुद रियासत की जमींदार बांका बाई का भी उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि उनके कार्यकाल से मंदिर की धार्मिक प्रतिष्ठा का संबंध रहा है। विजयादशमी सहित प्रमुख अवसरों पर गांधी चौक स्थित उनके स्मारक चबूतरे पर पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जाती है। इसी तरह मंदिर के प्रथम पुजारी के रूप में आदिवासी बीरसिंह गोड़ का नाम स्थानीय मान्यताओं में लिया जाता है। नवरात्र के दौरान निकलने वाली जवारा यात्रा और उनसे जुड़े देवस्थान पर पूजा-अर्चना इस क्षेत्र की पारंपरिक धार्मिक विरासत का हिस्सा मानी जाती है। इन परंपराओं के कारण मंदिर केवल पूजा का स्थल ही नहीं, बल्कि कुरुद की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण केंद्र भी है।

12 फीट गहरी प्राचीन बावड़ी क्यों है चर्चा में?

चंडी माई मंदिर के पूर्व दिशा में माता पुरैना तालाब के पास एक पुरानी सीढ़ीदार बावड़ी मौजूद है। इसकी गहराई करीब 12 फीट बताई जाती है। कठोर मुरूम चट्टानों के बीच बनी यह संरचना अपने निर्माण की तकनीक और पुराने समय में इसके उपयोग को लेकर लोगों की उत्सुकता बढ़ाती है। हालांकि, बावड़ी का निर्माण कब हुआ और इसे किसने बनवाया, इसकी पुष्टि करने वाला प्रमाणिक ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है। स्थानीय स्तर पर खुदाई के दौरान प्राचीन अवशेष मिलने की बातें भी कही जाती हैं, लेकिन इनके संबंध में स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि जरूरी है। विशेषज्ञों द्वारा वैज्ञानिक सर्वेक्षण और संरचना का पुरातात्विक अध्ययन इस बावड़ी के संभावित निर्माणकाल, तत्कालीन जल प्रबंधन व्यवस्था और कुरुद के ऐतिहासिक विकास से जुड़े सवालों के जवाब खोजने में मदद कर सकता है।

आस्था और विरासत का संगम है कुरुद का चंडी माई मंदिर

कुरुद का चंडी माई मंदिर धार्मिक विश्वास, पारंपरिक अनुष्ठानों और स्थानीय इतिहास की कई परतों को अपने भीतर समेटे हुए है। नवरात्र में होने वाले आयोजन, जवारा यात्रा, बांका बाई और बीरसिंह गोड़ से जुड़ी मान्यताएं तथा प्राचीन बावड़ी इस स्थल को विशेष पहचान देते हैं। मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और बावड़ी के निर्माणकाल का प्रमाणिक अध्ययन होने पर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के बारे में और जानकारी सामने आ सकती है। फिलहाल, चंडी माई का दरबार श्रद्धालुओं की आस्था और कुरुद की परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
 


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