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Bhairunda: भीषण गर्मी में पानी के लिए तरसे ग्रामीण, जिम्मेदारों का बेतुका बयान 

Bhairunda: भीषण गर्मी में पानी के लिए तरसे ग्रामीण, जिम्मेदारों का बेतुका बयान 

मुकेश प्रजापति, भैरूंदा (सीहोर): मध्य प्रदेश में जैसे-जैसे सूरज की तपिश बढ़ रही है और पारा नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है, वैसे-वैसे ग्रामीण अंचलों में पानी के लिए हाहाकार मचना शुरू हो गया है। ऐसा ही एक बेहद गंभीर मामला सीहोर जिले के भैरूंदा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले ग्राम मांगरोल से सामने आया है। यहाँ के ग्रामीण इस चिलचिलाती धूप में कई किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर पीने का पानी लाने को मजबूर हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि जब जनता की इस बुनियादी समस्या को लेकर विभागीय अधिकारियों से बात की गई, तो उन्होंने समाधान करने के बजाय हाथ खड़े करते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना जवाब दे डाला।

कुएं सूखे, हैंडपंपों ने छोड़ा साथ

ग्रामीणों का दर्द है कि जल स्तर (वाटर लेवल) पाताल में चले जाने के कारण गांव के पारंपरिक कुएं पूरी तरह सूख चुके हैं, वहीं नल-जल योजना के आने के बाद सुध न लेने से अधिकांश हैंडपंपों ने भी पानी देना बंद कर दिया है। सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना के तहत गांव के हर घर में पाइपलाइन बिछाकर कनेक्शन तो दे दिए गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पूरे गांव में मात्र एक या दो नलों में ही पानी आता है।

पानी के लिए 'दंगल'

मात्र दो नलों में पानी आने के कारण सुबह से ही वहां बर्तनों की लंबी कतारें लग जाती हैं। पानी भरने को लेकर ग्रामीणों के बीच आए दिन तीखी बहस और विवाद की स्थिति बन रही है। कई बार तो विवाद शांत होने से पहले ही पानी की सप्लाई बंद हो जाती है, जिससे आधी से ज्यादा जनता को खाली बर्तन लेकर ही वापस लौटना पड़ता है।

जिम्मेदारों का बेतुका बयान

पानी की इस भीषण किल्लत को लेकर मांगरोल के ग्रामीणों ने कई बार जनपद से लेकर जिले के अधिकारियों तक लिखित शिकायतें भेजीं, लेकिन एसी कमरों में बैठे अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। जब इस पूरी अव्यवस्था और बदहाली को लेकर नल-जल योजना से जुड़े संबंधित लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारी से सवाल किया गया, तो उनका जवाब तंत्र की नाकामी को उजागर करने वाला था। अधिकारी ने दो टूक कहा कि जब ग्राउंड सोर्स पर हमें ही पानी नहीं मिल रहा है, तो हम जनता को पानी कहां से सप्लाई करें? गांव की पानी की टंकी पूरी तरह नहीं भर पा रही है, जिसके कारण हम सुचारू रूप से पानी देने में पूरी तरह असमर्थ हैं।

सुलगता सवाल, तो प्लान-बी क्या है?

अधिकारियों का यह बेतुका तर्क ग्रामीणों के गले नहीं उतर रहा है। सवाल यह उठता है कि यदि गर्मी में जलस्रोत सूखने की आशंका थी, तो पहले से पेयजल परिवहन या अन्य वैकल्पिक व्यवस्थाएं क्यों नहीं की गईं? क्या करोड़ों रुपये खर्च करके बिछाई गई नल-जल योजना सिर्फ सर्दियों और बारिश के दिनों के लिए ही बनाई गई थी? फिलहाल मांगरोल के ग्रामीण इस भीषण तपिश में पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं और प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी या उग्र आंदोलन के इंतजार में बैठा दिखाई दे रहा है।


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