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क्या ईरान होर्मुज स्ट्रेट में लगाएगा ‘समुद्री टोल’? 600 साल पहले डेनमार्क ने भी वसूला था टैक्स...

क्या ईरान होर्मुज स्ट्रेट में लगाएगा ‘समुद्री टोल’? 600 साल पहले डेनमार्क ने भी वसूला था टैक्स...

Hormuz Strait Toll: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य पर टोल लगाने का संकेत दिया है। इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है कि क्या समुद्र में भी ‘टोल टैक्स’ वसूला जा सकता है। ईरान का कहना है कि यह प्रस्ताव सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और समुद्री प्रबंधन को मजबूत करने के लिए है। हालांकि, इसके पीछे आर्थिक और रणनीतिक कारण भी देखे जा रहे हैं।

क्यों अहम है होर्मुज स्ट्रेट?

होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है। ऐसे में यहां टोल लागू होने का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा कीमतों पर पड़ सकता है।

इतिहास में भी लग चुका है समुद्री टोल

समुद्री मार्गों पर टैक्स लगाने का विचार नया नहीं है। करीब 600 साल पहले डेनमार्क ने ऐसा ही एक सिस्टम लागू किया था, जिसे ‘साउंड ड्यूज़’ कहा जाता था।

क्या था ‘साउंड ड्यूज़’?

‘साउंड ड्यूज़’ एक समुद्री टोल था, जो ओरेसुंड जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर लगाया जाता था। यह मार्ग उत्तरी सागर और बाल्टिक सागर को जोड़ता है। इसे 1429 में लागू किया गया और  लगभग 400 साल तक जारी रहा है। 16वीं-17वीं सदी में यह डेनमार्क की आय का 2/3 हिस्सा था।

किन देशों से वसूला जाता था टैक्स?

डेनमार्क इस टोल को लगभग सभी विदेशी व्यापारिक जहाजों से वसूलता था, जिनमें नीदरलैंड, इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन, जर्मन व्यापारिक संघ (हैंसियाटिक लीग) शामिल थे,  हर जहाज को हेलसिंग्योर बंदरगाह पर रुककर टैक्स देना होता था, वरना सैन्य कार्रवाई तक की जाती थी।

कैसे बढ़ी डेनमार्क की कमाई?

1567 में टैक्स सिस्टम को बदलकर माल की कीमत का 1–2% कर दिया गया। इससे राजस्व तीन गुना तक बढ़ गया। सरकार के पास यह अधिकार भी था कि वह घोषित कीमत पर माल खरीद सकती थी, ताकि कोई कम कीमत न बताए।

कैसे खत्म हुआ यह टोल सिस्टम?

19वीं सदी तक यह टैक्स अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बाधा बन गया। इसके बाद 1857 में ‘कोपेनहेगन कन्वेंशन’ के तहत इसे खत्म कर दिया गया। इस समझौते में कई देशों ने डेनमार्क को मुआवजा दिया, जिसके बाद यह टोल हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

क्या ईरान का फैसला वैध होगा?

आधुनिक अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून, खासकर “फ्रीडम ऑफ नेविगेशन” सिद्धांत के तहत, प्राकृतिक जलमार्गों पर सभी देशों को बिना बाधा आवाजाही का अधिकार है। इसलिए अगर ईरान टोल लागू करता है, तो वैश्विक विरोध हो सकता है, कानूनी विवाद बढ़ सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है। इतिहास गवाह है कि समुद्री टोल से भारी कमाई संभव है, जैसा कि डेनमार्क ने ‘साउंड ड्यूज़’ के जरिए किया था। लेकिन आज के वैश्विक नियम और भू-राजनीतिक परिस्थितियां कहीं ज्यादा जटिल हैं। ईरान का यह कदम अगर लागू होता है, तो यह सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और व्यापार का बड़ा मुद्दा बन सकता है।


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