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इच्छामृत्यु के बाद हरीश राणा का अंतिम संस्कार: 13 साल कोमा में रहने के बाद मिली विदाई, अंगदान से 6 लोगों को जीवनदान

इच्छामृत्यु के बाद हरीश राणा का अंतिम संस्कार: 13 साल कोमा में रहने के बाद मिली विदाई, अंगदान से 6 लोगों को जीवनदान

गाजियाबाद/नई दिल्ली: 13 वर्षों तक कोमा में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करने वाले गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा को आखिरकार सम्मानजनक विदाई दी गई। बुधवार सुबह दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया। छोटे भाई आशीष राणा ने सुबह 9:40 बजे मुखाग्नि दी। इस दौरान माहौल बेहद भावुक रहा। पिता अशोक राणा ने हाथ जोड़कर उपस्थित लोगों से विनती की-“कोई मत रोना, बेटा शांति से विदा हो।” उनके इस भावुक अनुरोध ने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं।

 13 साल का संघर्ष, फिर इच्छामृत्यु का फैसला

हरीश राणा की जिंदगी वर्ष 2013 में एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी। चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान वे हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इस हादसे के बाद वे क्वाड्रिप्लेजिया के शिकार हो गए और कोमा में चले गए। पिछले 13 सालों से वे पूरी तरह लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर थे। परिवार ने हर संभव इलाज कराया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। अंततः परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। पहले हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उन्हें पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। इसके बाद उन्हें एम्स, दिल्ली में शिफ्ट किया गया, जहां 16 मार्च को उनकी फीडिंग ट्यूब हटा दी गई। 24 मार्च को उन्होंने अंतिम सांस ली।

अंगदान से 6 लोगों को नई जिंदगी

दुख की इस घड़ी में भी परिवार ने एक प्रेरणादायक निर्णय लिया। हरीश राणा के अंगदान की अनुमति दी गई, जिससे करीब छह लोगों को नई जिंदगी मिलने की उम्मीद है। डॉक्टरों के अनुसार फेफड़े, दोनों किडनी, आंखों के कॉर्निया दान किए गए हैं। यह कदम समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाली मिसाल बन गया है।

 भावुक विदाई, मंत्रों के बीच अंतिम संस्कार

अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान और गायत्री मंत्रों के साथ संपन्न हुआ। परिजन और परिचितों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। मां निर्मला राणा बेटे के जाने के गम में पूरी तरह टूट गईं, जबकि पिता ने खुद को संभालते हुए बेटे को शांतिपूर्वक विदा किया।

देश में इच्छामृत्यु पर फिर छिड़ी बहस

हरीश राणा का मामला देश में इच्छामृत्यु को लेकर नई बहस को जन्म दे रहा है। इसे उन चुनिंदा मामलों में माना जा रहा है, जहां सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद पैसिव यूथेनेशिया दी गई। गौरतलब है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी थी, जिसके तहत लाइलाज मरीजों के लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दी जाती है। यह मामला अब समाज और कानून दोनों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। 

क्या जीवन की गुणवत्ता और सम्मानजनक मृत्यु के बीच संतुलन संभव है?

हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि साहस, संवेदना और मानवीय मूल्यों की मिसाल बन गई है। जहां एक ओर उन्होंने 13 साल तक संघर्ष किया, वहीं दूसरी ओर उनके परिवार ने अंगदान के जरिए कई जिंदगियों में उम्मीद की नई किरण जगा दी।


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