Burhanpur Dhulkot: आसमान से बरसते अंगारे, झुलसा देने वाली गर्म हवाएं, प्यास से दरकती हुई बंजर जमीन और इन सबके बीच गले को तर करने के लिए बूंद-बूंद पानी को तरसती जिंदगी। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के आदिवासी ब्लॉक धुलकोट के सुदूर वनांचल से विकास के दावों को मुंह चिढ़ाती बेहद दर्दनाक तस्वीरें सामने आई हैं।
धुलकोट क्षेत्र के ग्राम भग्वानिया के सरबड़ गांव और रेखलिया झिरा फालिया में पानी का ऐसा हाहाकार मचा है कि जिसे देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। यह भयावह मंजर किसी अकाल प्रभावित देश का नहीं, बल्कि देश के उस सूबे का है जहां कागजों पर जल जीवन मिशन और 'हर घर नल' योजना के तहत शत-प्रतिशत काम पूरा होने के ढोल पीटे जाते हैं। धुलकोट के इन सुदूर आदिवासी बाहुल्य गांवों की मैदानी हकीकत आज भी बेहद क्रूर और बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर है।
खतरनाक ढलानों पर मौत का सफर
ग्राउंड जीरो पर पानी की तलाश और उसे घर तक लाने का यह पूरा सफर हर रोज किसी बड़ी दुर्घटना को आमंत्रण देता नजर आता है। तस्वीरों और मैदानी रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासी महिलाएं और मासूम बच्चियां पानी के लिए गहरी, संकरी और बेहद खतरनाक खाइयों व गड्ढों में उतरने को मजबूर हैं। इन गड्ढों में उतरने के लिए न तो कोई सीढ़ियां हैं और न ही कोई सुरक्षित रास्ता। ग्रामीण महिलाएं कहीं पेड़ों की लटकती जड़ों को पकड़कर नीचे उतरती हैं, तो कहीं पथरीली और फिसलन भरी ढलानों पर अपनी जान दांव पर लगाकर हर कदम बढ़ाती हैं। एक छोटी सी चूक यहां सीधे मौत के कुएं में धकेल सकती है।
पशु भी न पिएं ऐसा दूषित पानी
गहरी खाइयों में उतरने के बाद जो पानी इन ग्रामीणों को नसीब हो रहा है, उसकी स्थिति और भी भयावह है। गड्ढों के नीचे जमा पानी पूरी तरह से कीचड़ युक्त, गंदा और दूषित है। मौके पर मौजूद स्थिति को देखकर साफ कहा जा सकता है कि इस गंदे पानी को शायद कोई पशु भी पीने से हिचक जाए। लेकिन मजबूरी और प्यास का आलम यह है कि भग्वानिया और सरबड़ गांव के सैकड़ों कंठ इसी दूषित पानी के सहारे इस भीषण गर्मी और नौतपा को काटने के लिए विवश हैं। दूषित जल के कारण इन क्षेत्रों में जलजनित बीमारियों का खतरा भी तेजी से पांव पसार रहा है।
मासूमों का छिन रहा बचपन
इस पूरे जल संकट का सबसे दुखद और पीड़ादायक पहलू यह है कि इस कड़े संघर्ष की भट्टी में मासूम बचपन झुलस रहा है। जिन नन्हे-मुन्ने बच्चों की उम्र इस वक्त स्कूलों में बैठकर किताबें पढ़ने और अपना भविष्य संवारने की थी, इस भीषण जल संकट ने उनके हाथों में पढ़ाई के बजाय बाल्टियां, डिब्बे और गुंड (बर्तन) थमा दिए हैं। तपती दोपहर में ये बच्चे अपनी माताओं के साथ कोसों दूर पैदल चलकर पानी ढोने के काम में लगे हुए हैं।
प्रशासनिक अनदेखी पर बड़ा सवाल
यह तस्वीरें सिर्फ पानी की किल्लत की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि उन सभी सरकारी योजनाओं, करोड़ों के बजट और कागजी वादों की हकीकत को सरेआम बेनकाब करती हैं, जो आज भी मध्य प्रदेश के अंतिम छोर पर बैठे इन आदिवासी भाई-बहनों तक नहीं पहुंच पाई हैं। भीषण नौतपा और 44 डिग्री से अधिक के तापमान के बीच धुलकोट की यह चीख अब जिला प्रशासन से लेकर भोपाल तक के हुक्मरानों को झकझोरने के लिए काफी है।