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MP Cyber ​​Police: MP पुलिस ने किया फर्जी सिम नेटवर्क का बड़ा खुलासा

MP Cyber ​​Police: MP पुलिस ने किया फर्जी सिम नेटवर्क का बड़ा खुलासा

MP Cyber ​​Police: मध्य प्रदेश में साइबर ठगी के डिजिटल हथियार यानी फर्जी सिम कार्ड के खिलाफ पुलिस मुख्यालय ने अब तक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ दिया है। ऑपरेशन FACE के तहत साइबर पुलिस ने प्रदेशव्यापी नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि मध्य प्रदेश के 28 जिलों में 36,668 फर्जी सिम बेची गई हैं, जिनका इस्तेमाल धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग और फिशिंग जैसे अपराधों में हो रहा था।

10 चेहरों पर जारी हुईं 2600 से ज्यादा सिम

साइबर पुलिस ने तकनीक का इस्तेमाल कर 'ऑपरेशन फेस वन' में ऐसे 10 यूनिक चेहरों की पहचान की है, जिनके फोटो का दुरुपयोग कर 2,629 सिम जारी की गई थीं। ठगों ने POS (पॉइंट ऑफ सेल) संचालकों के साथ मिलकर एक ही व्यक्ति के आधार और फोटो के जरिए सैकड़ों अनजान लोगों के नाम पर सिम एक्टिवेट कर दी थीं।

ग्वालियर-चंबल और सागर में सबसे बड़ा 'जाल'

जांच में सामने आया है कि ग्वालियर-चंबल संभाग फर्जी सिमों का गढ़ बन चुका है, यहाँ अकेले 11,138 फर्जी सिम खपाई गई हैं। झांसी रोड थाना पुलिस ने इस मामले में आशीष नागर को गिरफ्तार कर उसके पास से 7 फर्जी सिम बरामद की हैं, जबकि मास्टरमाइंड एजेंट उमेश सिंह कुशवाह फिलहाल फरार है। वही सागर संभाग इलाका फर्जी सिम माफिया का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।

कहां कितनी फर्जी सिम?

पुलिस द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, गुना और राजगढ़ जैसे जिलों में फर्जी सिमों की संख्या डराने वाली है। सबसे ज्यादा गुना (3670), मुरैना (2714), राजगढ़ (2568), भिंड (2341), दतिया (1950) और सिंगरौली (1958) में फर्जी सिमें मिली है। तो वही भोपाल (1651), अनूपपुर (1701), कटनी (1307), नरसिंहपुर (1307), विदिशा (1245), सागर (1204) और छतरपुर (856) में मिली है। 

छतरपुर में पुलिस की बड़ी स्ट्राइक

छतरपुर जिले में फर्जी सिम के 856 मामले सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है। पुलिस ने जिले के अलग-अलग थानों में 10 से अधिक एफआईआर दर्ज की हैं। पुलिस को आशंका है कि इन सिमों का उपयोग बड़े स्तर पर ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी में किया गया है।

कैसे होता था खेल?

साइबर माफिया सिम एजेंटों के साथ मिलकर आम लोगों के केवाईसी (KYC) डेटा की चोरी करते थे। एक बार फोटो क्लिक होने के बाद, सॉफ्टवेयर या मिलीभगत के जरिए उसी फोटो को बार-बार इस्तेमाल कर अलग-अलग कंपनियों की सिम निकाल ली जाती थी। इन सिम कार्ड्स को बाद में ऊंचे दामों पर साइबर अपराधियों को बेच दिया जाता था।


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