भारत में ईरान के लगभग 56 हजार करोड़ रुपये (करीब 7 अरब डॉलर) फंसे होने का मुद्दा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया है। यह सिर्फ आर्थिक मामला नहीं बल्कि वैश्विक कूटनीति, अमेरिकी प्रतिबंधों और तेल व्यापार से जुड़ा एक जटिल मुद्दा है।
क्या है पूरा मामला?
भारत पहले ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता था। इस तेल के बदले भुगतान भारतीय बैंकों में जमा किया गया। लेकिन अमेरिका द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों (Sanctions) के कारण यह रकम सीधे ईरान को ट्रांसफर नहीं की जा सकी। नतीजतन, यह पैसा भारत में ही “फ्रीज” हो गया, यानी मौजूद तो है लेकिन ईरान इसका उपयोग नहीं कर सकता।
दुनियाभर में फंसे हैं ईरान के अरबों डॉलर
भारत अकेला देश नहीं है जहां ईरान का पैसा फंसा है। रिपोर्ट्स के अनुसार चीन लगभग 20 अरब डॉलर, इराक करीब 6 अरब डॉलर, जापान लगभग 1.5 अरब डॉलर, कतर करीब 6 अरब डॉलर, यूरोप और अमेरिका लगभग 2 अरब डॉलर वापस करेगी, कुल मिलाकर, ईरान के 100 अरब डॉलर से ज्यादा के एसेट्स दुनियाभर में फ्रीज बताए जाते हैं।
फ्रोजन एसेट्स क्या होते हैं?
जब किसी देश की संपत्ति (पैसा, निवेश या प्रॉपर्टी) को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों या कानूनी कारणों से रोक दिया जाता है, तो उसे फ्रोजन एसेट्स कहा जाता है। यह आमतौर पर तब होता है जब किसी देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन होता है। सुरक्षा या राजनीतिक कारण होते हैं।
अमेरिका की भूमिका क्यों अहम है?
ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध इस पूरे मुद्दे की जड़ हैं। अमेरिका को आशंका है कि यह पैसा ईरान के परमाणु या सैन्य कार्यक्रम में इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए वह सीधे फंड रिलीज करने के पक्ष में नहीं है। कई बार बातचीत के बावजूद इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई है।
भारत पैसा वापस क्यों नहीं कर सकता?
भारत के सामने सबसे बड़ी बाधा है अमेरिकी प्रतिबंध। भारत को वैश्विक बैंकिंग सिस्टम और डॉलर आधारित लेनदेन के नियमों का पालन करना पड़ता है। सीधे भुगतान करने पर भारत को भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए यह रकम कानूनी रूप से “रुकी” हुई है।
क्या समाधान संभव है?
ईरान लगातार इस पैसे की वापसी की मांग कर रहा है और इसे “कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर” के तौर पर देखता है। हालांकि समाधान तभी संभव है जब अमेरिका-ईरान संबंधों में सुधार हो, प्रतिबंधों में ढील मिले, किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर सहमति बने। भारत में फंसे ईरान के 56 हजार करोड़ रुपये सिर्फ एक आर्थिक लेनदेन नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, प्रतिबंधों और कूटनीतिक संतुलन का जटिल उदाहरण हैं। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति नहीं बनती, तब तक यह रकम यूं ही बैंकों में फंसी रह सकती है।