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जेल में क्यों बंद है 3.71 लाख विचाराधीन कैदी, NCRB ने किया बड़ा खुलासा, जानें पूरी खबर

जेल में क्यों बंद है 3.71 लाख विचाराधीन कैदी, NCRB ने किया बड़ा खुलासा, जानें पूरी खबर

भोपाल : भारत की जेलों में बंद कैदियों की संख्या उनकी स्वीकृत क्षमता से कहीं अधिक है। जिसकी वजह से कैदियों को न सिर्फ रहन सहन में दिक्कत आ रही है। बल्कि सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे है। इसी के चलते NCRB ने एक रिपोर्ट पेश की है। जिसके अनुसार भारत की जेलों में सबसे ज्यादा विचाराधीन कैदी बंद है। यह वह कैदी है। जो न तो दोषी सिद्ध हुए न बेगुनाह। ऐसे में एनसीआरबी कि ये रिपोर्ट ना सिर्फ जिलों की बदत्तर स्थिति को बयां कर रही है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति पर भी सवाल खड़े कर रही है। 

 1,333 जेलों में कैदियों की कुल क्षमता 4.53 लाख

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2024 की रिपोर्ट हाल ही में सामने आई है। रिपोर्ट बताती है कि देश की 1,333 जेलों की कुल क्षमता 4.53 लाख कैदियों की है। बावजूद इसके इन जेलों में 5.11 लाख लोग बंद हैं, यानी क्षमता से 12.7% ज्यादा। इतना ही नहीं राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी सबसे ज्यादा विचाराधीन कैदी बंद है। 

जेलें में क्षमता से 50 प्रतिशत अधिक कैदी बंद

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की जेलों में 194% occupancy है। यानी 100 लोगों के लिए बनी जगह में 194 लोग रह रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में 2015 में 78% था, 2024 में 148% हो गया। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश भी इस समस्या से अछूता नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य की 133 जेलों की क्षमता लगभग 30 हजार कैदियों की है, जबकि इनमें 45 हजार से अधिक कैदी बंद पाए गए। यानी जेलें अपनी क्षमता से लगभग 50 प्रतिशत अधिक दबाव झेल रही हैं।

न्यायिक प्रक्रिया में देरी

रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि जेलों में भीड़भाड़ का सीधा संबंध न्यायिक प्रक्रिया में देरी, जमानत संबंधी कठिनाइयों और लंबित मुकदमों से है। कई राज्यों में विचाराधीन कैदियों की संख्या दोषसिद्ध कैदियों से दो से तीन गुना अधिक है। जेलों में कैदियों की संख्या के रुझानों का विश्लेषण न केवल भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की स्थिति पर प्रकाश डालता है, बल्कि निष्पक्षता, मानवाधिकारों और सजा एवं पुनर्वास के बीच संतुलन जैसे प्रश्न भी उठाता है। 

हजारों कैदी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे

जेलों में बढ़ती भीड़ का असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखाई दे रहा है। NCRB के पूर्व आंकड़ों के अनुसार हजारों कैदी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या विचाराधीन कैदियों की है। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक भीड़, अनिश्चित भविष्य और लंबी न्यायिक प्रक्रिया मानसिक तनाव को बढ़ाती है। इसके लिए अदालतों में लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे, प्रभावी कानूनी सहायता, अंडरट्रायल रिव्यू कमेटियों की सक्रियता, फास्ट ट्रैक अदालतों और जमानत प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है।
 


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