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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना ट्रांजिट रिमांड दूसरे राज्य से लाना गैरकानूनी, साइबर केस में युवक को मिली राहत

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना ट्रांजिट रिमांड दूसरे राज्य से लाना गैरकानूनी, साइबर केस में युवक को मिली राहत

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अंतरराज्यीय साइबर फ्रॉड मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति को दूसरे राज्य से गिरफ्तार कर बिना ट्रांजिट रिमांड के लाना संविधान और कानून दोनों का उल्लंघन है। अदालत ने हरियाणा के रोहतक निवासी 28 वर्षीय युवक की गिरफ्तारी और हिरासत को अवैध करार देते हुए उसकी रिहाई का आदेश दिया।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करते हैं। यदि किसी व्यक्ति को पुलिस अपने नियंत्रण में लेती है, तो उसे निर्धारित समय के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में गिरफ्तारी मेमो तैयार कर पहले की गई अवैध हिरासत को वैध नहीं बनाया जा सकता।

शेयर मार्केट निवेश के नाम पर दर्ज हुआ था मामला

यह मामला सरगुजा रेंज के साइबर थाना में दर्ज एक साइबर ठगी प्रकरण से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार निवेश पर अधिक मुनाफे का झांसा देकर पीड़ित से करीब 21.15 लाख रुपये विभिन्न बैंक खातों में जमा कराए गए थे। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया था।

याचिकाकर्ता ने लगाया अवैध हिरासत का आरोप

युवक ने हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा कि उसे 28 जून 2026 को हरियाणा स्थित उसके घर से पुलिस अपने साथ लेकर आई। आरोप है कि पुलिस ने किसी भी मजिस्ट्रेट से ट्रांजिट रिमांड प्राप्त नहीं किया और कई राज्यों से होते हुए सीधे छत्तीसगढ़ ले आई। बाद में औपचारिक गिरफ्तारी दिखाकर उसे न्यायालय में पेश किया गया।

पुलिस ने बताया स्वेच्छा से आया था युवक

राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि युवक को गिरफ्तार नहीं किया गया था। उसे केवल जांच में सहयोग के लिए नोटिस दिया गया था और वह अपनी इच्छा से पुलिस टीम के साथ अंबिकापुर आया। पुलिस के अनुसार पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद 30 जून को उसकी औपचारिक गिरफ्तारी की गई। जांच एजेंसी ने यह भी कहा कि मामला बड़े अंतरराज्यीय साइबर फ्रॉड और हवाला नेटवर्क से जुड़ा है, जिसमें एक हजार करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन की जांच की जा रही है।

अदालत ने पुलिस की दलील नहीं मानी

रिकॉर्ड और परिस्थितियों का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि युवक शुरुआत से ही पुलिस के प्रभावी नियंत्रण में था। अदालत ने कहा कि नोटिस पर दर्ज सहमति को स्वैच्छिक यात्रा का प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसकी स्वतंत्र आवाजाही पहले ही समाप्त हो चुकी थी। इसलिए ट्रांजिट रिमांड लिए बिना उसे दूसरे राज्य ले जाना असंवैधानिक प्रक्रिया है।

रिमांड आदेश भी किए निरस्त

हाईकोर्ट ने कहा कि जब प्रारंभिक गिरफ्तारी ही कानून के अनुरूप नहीं थी, तो उसके आधार पर जारी न्यायिक हिरासत और पुलिस रिमांड के आदेश भी टिक नहीं सकते। अदालत ने संबंधित रिमांड आदेशों को निरस्त करते हुए आरोपी को 5 लाख रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही पासपोर्ट जमा कराने और न्यायालय की अनुमति के बिना विदेश न जाने जैसी शर्तें भी लगाई गईं।

जांच जारी रहेगी, लेकिन कानून के दायरे में

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल गिरफ्तारी और हिरासत की वैधता से संबंधित है। साइबर फ्रॉड के मूल आरोपों पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है। जांच एजेंसी कानून के अनुसार जांच जारी रख सकती है, लेकिन प्रत्येक कार्रवाई संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप ही करनी होगी।


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