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हरिभूमि- आईएनएच का 'कृषि संवाद': मंत्री नेताम बोले- खेती में फायदे के लिए करनी होगी इंटीग्रेटेड फार्मिंग

हरिभूमि- आईएनएच का 'कृषि संवाद': मंत्री नेताम बोले- खेती में फायदे के लिए करनी होगी इंटीग्रेटेड फार्मिंग

कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में किसानों को समन्वित खेती यानी इंटीग्रेटेड फार्मिंग करने की जरूरत है, यह करने से ही किसानों की आय बढ़ेगी और खेती का लाभ मिलेगा। उन्होंने राज्य के छोटे और सीमांत किसानों के लिए कहा कि इन किसानों को आपस में मिलकर सहकारिता के साथ काम करने की जरूरत है। यह करने से फसल की अच्छी क्वालिटी और अधिक उत्पादन मिलेगा, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया तो नुकसान होगा। श्री नेताम ने यह बात शनिवार को आईएनएच हरिभूमि के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के सवालों के जवाब में कृषि संवाद कार्यक्रम में कही। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश।

राज्य सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के रूप में आप काम कर रहें, लेकिन इससे पहले भी आप कई विभागों के मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं, लेकिन इस बार जब आपको बताया गया कि कृषि विभाग संभालना है, तो इसे कैसे देखा क्या समझ में आया आपको।
अपनी बात की शुरुआत करते हुए श्री नेताम ने सबसे पहले आईएनएच हरिभूमि के प्रति आभार जताया कि उन्हें इस मंच पर इतने महानुभवों के साथ विचार साझा करने का अवसर दिया गया। उन्होंने कहा कि कृषि विभाग संभालना सौभाग्य की बात है, जिन लोगों को ये अवसर मिला है, उनमें से एक मैं भी हूं। कृषि मंत्री होना प्रदेश के किसान भाईयों की आशा और उम्मीद की किरण की तरह होता है।

 

पिछली सरकार में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री थे, वे खुद को किसान बताते है, उन्होंने नरवा-गरवा-घुरवा बाड़ी सहित कई अन्य कार्यक्रम भी चलाए। उनके काम करने के बाद आपके लिए क्या काम बचा है।
उन्होंने सपने बेचने का काम किया, इसका खामियाजा छत्तीसगढ़ के किसानों को भुगतना पड़ा। अब हमारे जिम्मे ये जो काम है वह हमारे लिए मौका है। हमारी सरकार ने किसानों को धान का मूल्य 31 सौ रुपए प्रति क्विंटल दिलाया, 21 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से धान खरीद रहे है, किसानों के लिए खाद, बीज से लेकर बाजार की सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं। किसानों को और अधिक सुविधा कैसे मिले, यह सोच कर विभाग काम कर रहा है, हालांकि ये काम शत प्रतिशत नहीं हुआ है। अगर इतना सब पूरा कर लें तो प्रश्न ही नहीं रहेगा। किसान और कृषि जब तक रहेंगे तब तक उनकी दिक्कतें, पानी, बिजली, खाद, बीज आदि की समस्या रहेगी। लेकिन सरकार की नीति और नीयत साफ है। राज्य में अमानक बीज, खाद बेचने वालों के खिलाफ पहली बार इतनी सख्त कार्रवाई और एफआईआर भी हुई है। किसान को कोई ठगे नहीं, उन्हें उपज की पूरी कीमत मिले यह सोचकर हम काम कर रहे हैं। कोई शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है। सरकार किसानों को लेकर संवेदनशील और गंभीर है।

 

राज्य में छोटे और सीमांत किसान मिलकर सहकारिता के माध्यम से काम करें, इसके लिए सरकार क्या कर रही है।
इस दिशा में काम करने के लिए बहुत से एफपीओ बनाए गए हैं। जब तक किसान सहकारिता के आधार पर काम नहीं करेंगे तब तक लाभ नहीं मिलेगा। यह करने के लिए किसानों को इंटिग्रेटेड फार्मिंग करनी होगी। खरीफ और रबी दोनों सीजन में धान की फसल लेंगे तो जमीन की उत्पादकता कम होगी, ये बात हमारे पूर्वज भी बताते थे, यही बात अब वैज्ञानिक भी बताते हैं। इस तरह से जो किसान काम कर रहे हैं तो अच्छी क्वालिटी का अधिक उत्पादन मिल रहा है। लेकिन किसान अगर इस पर ध्यान नहीं देंगे तो नुकसान होगा।प्रदेश में किसान स्वसहायता समूह और एफपीओ के माध्यम से काम कर रहे हैं और अधिक उत्पादन ले रहे है। जैविक खेती की जा रही है, चावल की किस्मे, जीराफूल, जवां फूल, काली मूछ का उत्पादन कर रहे हैं, जिन किसानों ने इस तरह खेती के लिए समूह बनाए हैं, वे सफल है। इसी दिशा में लघु और सीमांत किसानों को भी काम करना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में किसान अभी भी एक फसल पर निर्भर है, और सिंचाई के साधनों की भी कमी है।
इस बात की चिंता हमारे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को भी है। हमारे यहां किसान खरीफ में धान की फसल लेते हैं, इसके बाद 70 फीसदी जमीन खाली पड़ी रह जाती है। प्रधानमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री की भी यही चिंता है कि खाली पड़े क्षेत्र में दलहन-तिलहन की फसल ले। इस दिशा में काम करने के लिए राज्य में दलहन और तिलहन मिशन काम कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में दलहन-तिलहन के साथ साग सब्जी का रकबा भी बढ़ रहा है।

प्रतिशत खाली जमीन पर धान के बाद खाली रहने पर उस रकबे को करने की योजना क्या योजना आपने बनाई है।
हम हर साल लक्ष्य तय करते हैं, दलहन और तिलहन के लिए। इसके साथ ही पाम आयल पर भी काम हो रहा है, रबी सीजन में मक्का भी उगा रहे हैं। अगर रबी के सीजन में धान की जगह मक्का की फसल ली जाए तो अधिक लाभ मिलेगा। धान से अधिक मक्का का उत्पादन होगा। मक्का की खेती के बाद बचे अवशेष भी उपयोगी है। मैं राज्य के किसानों से निवेदन करता हूं कि वे रबी में धान की जगह मक्का, दलहन, तिलहन की खेती करें। तो उससे पानी भी बचेगा।

 

किसानों की आय दो गुना करने की बात होती है, लेकिन ये इस पर बात नहीं होती कि कृषि की लागत कितनी हो गई है।
मैं खुद भी किसान हूं। गर्व से कहता हूं कि चावल, दाल, गेंहू, मक्का सब घर में ही उत्पादित होता है। यहां तक कि सब्जी, प्याज आलू भी हम घर में ही उगाकर खाते हैं। इसी तरह की सोच के साथ सभी किसान काम करेंगे तो आय बढ़ेगी। यही नहीं कुछ किसान ड्रैगन फ्रुट, अमरूद, टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च, मिर्च, की खेती कर रहे हैं जो दिल्ली, यूपी तक जाकर बिक रही है। प्रदेश सौभाग्यशाली है कि यहां पानी की कोई कमी नहीं है, इसी वजह से फिशरीज पर अच्छा काम हो रहा है, यह कारोबार देश में पांचवे नंबर पर है। जितनी भी वाटर बाड़ीज है उसका पूरा उपयोग करेंगे को काम और बेहतर होगा।

नए तालाब बनाने, सुधरवाने की क्या योजना है
हम जहां उत्पादन बढ़ाने की बात करते हैं वहां काम कई विभाग मिलकर करते हैं। जैसे धान कृषि विभाग धान उगाने, मार्कफेड धान खरीदी और खाद्य विभाग उससे चावल बनाने का काम करता है। लेकिन होता ये है कि इस काम में गड़बड़ी होती है तो बात मुझे सुननी पड़ती है। मैं यहां चार घंटे से मौजूद हूं, मुझे तो सुनना ही है और रास्ता निकालना है। हमारे किसान यदि खेती में समन्वित प्रयास करे, कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन, मत्स्य पालन करें तो इसमें काफी संभावना है। हम सब मिलकर इसका उपयोग करें, जिनके पास जमीन है, वे भी जिनके पास नहीं है, वो भी ये काम कर सकते हैं।

बटाइदार किसानों को फायनेंस की सुविधा नहीं मिलने की बात सामने आई है, इसके लिए क्या करेंगे।
इसी तरह के बहुत सारे मौलिक सवाल सामने आए हैं, इस पर निर्णय तक पहुंचना होगा।

पशुपालन चुनौतीपूर्ण है, यह किसान के जीवन का हिस्सा क्यों नहीं बन पा रहा है। हालत ये है कि आवारा पशु के रूप में गायें सड़क पर दिखती हैं और इससे दुर्घटनाएं भी होती हैं।
छत्तीसगढ़ में पशुपालन के क्षेत्र में संभावना की कमी नहीं है। पशुपालन सनातन धर्म में भी महत्ता का विषय रहा है। जिस घर में गौ माता रहती है वहां दोष नहीं आता, बीमारी नहीं आती ये माना जाता है, लेकिन अब लोगों का माइंडसेट बदल गया है। आज भी राज्य में दूध का उत्पादन जरुरत के अनुरूप नहीं है। लोग दुकान से दूध लाते हैं, बोतलबंद दूध लाते हैं, मिठाई शुद्ध खोवे से बनी है या नहीं पता, नहीं, लोग जहर खा रहे है। शुद्धता घर से मिलनी चाहिए। हर घर में एक गाय पालनी चाहिए। इस दिशा में सोचकर चलें तो दूध भी मिलेगा और आवारा पशु भी नहीं दिखेंगे। अभी हालत ये है कि दूध देते रहने तक गौ माता, दूध बंद को आवारा पशु। ये सोच बदलनी चाहिए। गाय लक्ष्मी का रूप है ये मानकर सेवा करनी चाहिए. क्योंकि उससे दूध, गोबर और गौ मूत्र मिलता है। गाय की हर चीज उपयोगी है। पशुपालन के क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए एनडीडीबी से समझौता किया गया है। मिल्क चेन बनाई गई है। पहले 25 मिल्क चेन बनाई गई अब बलरामपुर में इनकी संख्या 50 से अधिक हो गई है। यह काम करने वाली महिलाओं के खाते में 4 माह में 3 करोड़ रुपए जमा हो गए। लेकिन यह काम उन्ही लोगों को करना चाहिए जिनकी इस काम में रुचि है। मैंने विभाग से भी कहा है कि पहले ये देखें कि कौन इसके लायक है। उसे ही इस काम से जोड़े। रही बात आवारा पशु की तो यह काम ग्रामीण क्षेत्र में पंचायतों का है और क शहरों में नगरीय निकायों का। इन्हें आवारा पशुओं पर नियंत्रण करना चाहिए।


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