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Bastar Dussehra 2026: 75 दिनों तक चलता है बस्तर का अनोखा दशहरा, जानिए सदियों पुरानी परंपराओं की कहानी

Bastar Dussehra 2026: 75 दिनों तक चलता है बस्तर का अनोखा दशहरा, जानिए सदियों पुरानी परंपराओं की कहानी

रायपुर। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में बस्तर दशहरा का विशेष स्थान है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह अनूठा महापर्व जनजातीय आस्था, लोक परंपराओं और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक माना जाता है। मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा से जुड़ा यह उत्सव देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। यहां रावण दहन के बजाय पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों, देवी-देवताओं की आराधना और ऐतिहासिक रस्मों को विशेष महत्व दिया जाता है। बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान और सामाजिक परंपराओं का जीवंत स्वरूप है। इस महापर्व में स्थानीय जनजातीय समुदायों, ग्रामीणों, पारंपरिक पदाधिकारियों और श्रद्धालुओं की भागीदारी इसे विशिष्ट बनाती है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार की ओर से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को प्रोत्साहित करने और बस्तर की पहचान को व्यापक स्तर पर सामने लाने पर जोर दिया जा रहा है।

बस्तर दशहरा का इतिहास और सांस्कृतिक महत्व

बस्तर दशहरे की परंपरा का संबंध बस्तर के ऐतिहासिक राजपरिवार और मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा है। इस उत्सव को समय के साथ राजपरिवार की परंपरा से आगे बढ़कर पूरे क्षेत्र की सामूहिक सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रतिष्ठा मिली। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां उत्सव का केंद्र भगवान राम की रावण पर विजय का मंचन नहीं, बल्कि देवी आराधना और बस्तर की पारंपरिक धार्मिक मान्यताएं हैं। विभिन्न गांवों और समुदायों की सहभागिता इस पर्व को जनजातीय जीवन, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक निरंतरता से जोड़ती है। पीढ़ियों से चली आ रही रस्में बस्तर के लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखती हैं। यही वजह है कि बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जाना जाता है।

75 दिनों तक चलने वाले उत्सव की प्रमुख रस्में

बस्तर दशहरे की शुरुआत हरेली अमावस्या के अवसर पर होने वाली पाट जात्रा से मानी जाती है। इस रस्म में रथ निर्माण से जुड़ी लकड़ी और औजारों की पूजा की जाती है। इसके बाद अलग-अलग चरणों में होने वाले अनुष्ठान उत्सव को आगे बढ़ाते हैं।

1. पाट जात्रा: यह बस्तर दशहरे की शुरुआत से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपरा है। इसमें रथ निर्माण के लिए उपयोग होने वाली लकड़ी और औजारों का पूजन किया जाता है।

2. काछिनगादी: इस रस्म में काछिन देवी की आराधना कर उत्सव की पारंपरिक शुरुआत और रथ संचालन से जुड़ी अनुमति की मान्यता निभाई जाती है।

3. जोगी बिठाई: उत्सव की निर्विघ्न पूर्णता की कामना से जुड़ी यह परंपरा तपस्या, साधना और धार्मिक आस्था का प्रतीक है।

4. रथ परिक्रमा: विशाल लकड़ी के रथ को श्रद्धालु और स्थानीय समुदाय पारंपरिक तरीके से खींचते हैं। यह आयोजन जनभागीदारी और सामूहिक एकता को प्रदर्शित करता है।

5. मावली परघाव: इस रस्म में दंतेवाड़ा से आने वाली मां दंतेश्वरी की डोली और उनसे जुड़े धार्मिक प्रतीकों का पारंपरिक स्वागत किया जाता है।

6. निशा जात्रा: रात्रि में आयोजित होने वाला यह अनुष्ठान देवी आराधना और बस्तर की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं से जुड़ा है।

7. मुरिया दरबार: यह बस्तर दशहरे की प्रमुख परंपराओं में शामिल है, जिसमें जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक पदाधिकारियों की सहभागिता देखने को मिलती है।

इन रस्मों की विविधता बस्तर दशहरे को केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामाजिक सहभागिता का विस्तृत आयोजन बनाती है।

मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता

बस्तर दशहरे के ऐतिहासिक मुरिया दरबार को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता के मद्देनजर प्रशासनिक तैयारियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 23 अक्टूबर को प्रस्तावित कार्यक्रम से पहले अधिकारियों ने आयोजन स्थलों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं की समीक्षा की है। कमिश्नर डोमन सिंह, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने मां दंतेश्वरी मंदिर, सिरहासार भवन और लालबाग मैदान में तैयारियों का जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान मंच व्यवस्था, सुरक्षा प्रबंध, बैरिकेडिंग, यातायात नियंत्रण और आम नागरिकों की सुविधाओं से जुड़े कार्यों की समीक्षा की गई। 

प्रदर्शनी की तैयारियों पर भी ध्यान दिया

सिरहासार भवन में पारंपरिक मुरिया दरबार की बैठक व्यवस्था और लालबाग मैदान में प्रस्तावित आमसभा तथा सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित प्रदर्शनी की तैयारियों पर भी ध्यान दिया गया। राष्ट्रपति की प्रस्तावित उपस्थिति से बस्तर की ऐतिहासिक परंपराओं और जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर अतिरिक्त पहचान मिलने की उम्मीद है। हालांकि, कार्यक्रम में सहभागिता और आयोजन से संबंधित अंतिम जानकारी के लिए आधिकारिक पुष्टि देखना आवश्यक है।

मां दंतेश्वरी की आराधना है उत्सव का प्रमुख आधार

बस्तर दशहरे की धार्मिक पहचान मां दंतेश्वरी के प्रति अटूट श्रद्धा से जुड़ी है। उत्सव के दौरान स्थानीय देवी-देवताओं और ग्राम देवताओं को विशेष सम्मान दिया जाता है। बस्तर की धार्मिक परंपराएं प्रकृति, आध्यात्मिक विश्वास और सामुदायिक जीवन के आपसी संबंध को भी दर्शाती हैं। इस पर्व की तैयारियों और अनुष्ठानों में स्थानीय समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। पारंपरिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले लोग और ग्रामीण मिलकर उत्सव को आगे बढ़ाते हैं। इस सहभागिता से सांस्कृतिक ज्ञान और परंपराएं नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं। बस्तर दशहरा इस बात का उदाहरण है कि धार्मिक आस्था किस तरह किसी क्षेत्र की सामाजिक पहचान और सामूहिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।

छत्तीसगढ़ सरकार की पहल और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण

बस्तर दशहरे जैसी ऐतिहासिक परंपरा को संरक्षित रखने के लिए केवल उत्सव का आयोजन पर्याप्त नहीं है। इसके साथ सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, आधारभूत सुविधाओं का विकास और पारंपरिक कलाओं को प्रोत्साहन देना भी जरूरी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की प्राथमिकता के तहत बस्तर की विशिष्ट पहचान को व्यापक मंच देने का महत्व है। पर्यटन सुविधाओं में सुधार और सांस्कृतिक आयोजनों को प्रोत्साहित करने से स्थानीय लोगों के लिए आर्थिक अवसर भी बढ़ सकते हैं। ऐसी पहलों का उद्देश्य परंपराओं को आधुनिक विकास के साथ जोड़ना है, ताकि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बनी रहे और आने वाली पीढ़ियां भी अपनी विरासत को समझ सकें।

हस्तशिल्प और स्थानीय कारोबार को मिलता है अवसर

बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यहां का पारंपरिक हस्तशिल्प है। डोकरा कला, टेराकोटा, लकड़ी की कलाकृतियां और अन्य स्थानीय शिल्प यहां की रचनात्मक परंपराओं को दर्शाते हैं। बस्तर दशहरे के दौरान स्थानीय बाजारों और पारंपरिक उत्पादों को प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है। पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से हस्तशिल्पियों, छोटे व्यापारियों, परिवहन सेवाओं, खानपान और आवास से जुड़े कारोबार को लाभ मिलने की संभावनाएं रहती हैं। जगदलपुर में बस्तर दशहरा पसरा जैसी सुविधाओं और स्थानीय बाजारों का महत्व इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। पारंपरिक उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध होने से कारीगरों की आजीविका को सहारा मिल सकता है और स्थानीय कौशल को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

मुरिया दरबार: जनजातीय समाज के संवाद की परंपरा

बस्तर दशहरे का मुरिया दरबार ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह परंपरा विभिन्न गांवों और समुदायों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाने का माध्यम रही है। मुरिया दरबार में पारंपरिक पदाधिकारियों और जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों की सहभागिता के जरिए स्थानीय मुद्दों और सामाजिक अपेक्षाओं को सामने रखने की परंपरा दिखाई देती है। इस तरह यह आयोजन सांस्कृतिक उत्सव के साथ जनसंवाद और सामुदायिक सहभागिता का भी उदाहरण बनता है। इस परंपरा का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि यह बस्तर की सामाजिक संरचना और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से जुड़े ऐतिहासिक पहलुओं को सामने लाती है।

पर्यटन के जरिए बस्तर को मिल सकती है व्यापक पहचान

बस्तर दशहरा देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले पर्यटकों को छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को करीब से समझने का अवसर देता है। लंबे समय तक चलने वाला उत्सव, विशाल रथ, पारंपरिक अनुष्ठान, लोककलाएं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी इसे सांस्कृतिक पर्यटन के लिए खास बनाती हैं। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बेहतर परिवहन, स्वच्छता, पर्यटक मार्गदर्शन, सुरक्षा और सांस्कृतिक स्थलों की जानकारी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है। स्थानीय हस्तशिल्प और पारंपरिक खानपान को पर्यटन से जोड़कर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी प्रोत्साहन दिया जा सकता है। यदि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ पर्यटन सुविधाओं का संतुलित विकास किया जाए, तो बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान को और मजबूत करने में योगदान दे सकता है।

परंपरा और विकास का अनूठा संगम है बस्तर दशहरा

बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की उस सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें धार्मिक आस्था, जनजातीय परंपराएं, लोककला और सामाजिक सहभागिता एक साथ दिखाई देती हैं। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व बस्तर की ऐतिहासिक पहचान को जीवंत बनाए रखता है। मां दंतेश्वरी की आराधना से लेकर रथ परिक्रमा और मुरिया दरबार तक, इसकी प्रत्येक प्रमुख परंपरा अपने भीतर सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व समेटे हुए है। विरासत का संरक्षण, स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन और पर्यटन सुविधाओं का विकास इस उत्सव की पहचान को आने वाले वर्षों में और व्यापक बना सकता है। बस्तर दशहरा केवल अतीत की परंपराओं का उत्सव नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता, सामुदायिक एकता और भविष्य की संभावनाओं का भी प्रतीक है।


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