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देशभर में दशहरे की धूम, इस गांव में महिषासुर की याद में शोक मना रहे लोग 

देशभर में दशहरे की धूम, इस गांव में महिषासुर की याद में शोक मना रहे लोग 

दशहरा आते ही देशभर में रावण दहन, रामलीला और उत्सव का माहौल नजर आने लगता है। लेकिन झारखंड के लातेहार जिले में रहने वाली असुर जनजाति की परंपरा इससे अलग है। यहां विजयादशमी के आसपास खुशियां मनाने के बजाय समुदाय के लोग शोक की रस्में निभाते हैं। इसकी वजह महिषासुर से जुड़ी उनकी मान्यता है। असुर समुदाय के लोग महिषासुर को अपना पूर्वज और अपनी जमीन का राजा मानते हैं।

महिषासुर की मृत्यु को लेकर अलग मान्यता

असुर जनजाति के लोगों की मान्यता है कि महिषासुर उनके पूर्वज थे। समुदाय के कुछ लोगों का कहना है कि महिषासुर महिलाओं पर हथियार नहीं उठाते थे और उन्हें देवी दुर्गा के माध्यम से छल से मारा गया। इसी विश्वास के कारण वे दुर्गा पूजा के दौरान होने वाले उत्सवों में शामिल नहीं होते और अपने पूर्वज की याद में शोक मनाते हैं।

यह मान्यता दुर्गा पूजा से जुड़ी प्रचलित धार्मिक कथा से अलग नजरिया प्रस्तुत करती है। महिषासुर को लेकर विभिन्न समुदायों की धारणाएं उनकी लोकपरंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक विश्वासों से जुड़ी हुई हैं।

नवमी और दशमी को निभाई जाती हैं शोक की रस्में

लातेहार में असुर समुदाय के लोग दुर्गा पूजा की नवमी और दशमी के दौरान शोक पर्व मनाते हैं। उनके अनुसार, यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और आज भी समुदाय के लोग इसे निभाते हैं।

शोक मनाने का तरीका भी खास है। समुदाय के लोग इसे किसी अपने की मृत्यु के बाद होने वाले शोक की तरह मानते हैं। इस दौरान वे उत्सव से दूरी बनाकर अपने रीति-रिवाजों का पालन करते हैं।

दो दिन तक खान-पान में भी रखते हैं परहेज

शोक पर्व के दौरान असुर जनजाति के लोग सादा भोजन करते हैं। समुदाय के लोगों के मुताबिक, बड़े लोग इस अवधि में मांस-मछली खाने से परहेज करते हैं, जबकि छोटे बच्चों को कुछ छूट दी जाती है।

समुदाय के लोग दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन में भी शामिल नहीं होते। उनकी परंपरा के अनुसार, विसर्जन के बाद शोक की अवधि समाप्त होती है और वे सामान्य खान-पान शुरू करते हैं।

रावण को भी पूर्वज मानकर पूजा करते हैं कुछ लोग

इस क्षेत्र में रावण को पूर्वज मानकर उसकी पूजा करने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यताएं बताती हैं कि रामायण और दुर्गा पूजा से जुड़े प्रसंगों को सभी समुदाय एक ही नजरिए से नहीं देखते।

जहां देश के कई हिस्सों में रावण दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, वहीं कुछ समुदायों की सांस्कृतिक परंपराएं अलग हैं। इन परंपराओं को समझने के लिए स्थानीय इतिहास, लोकविश्वास और समुदाय की अपनी व्याख्याओं को जानना जरूरी है।

पीढ़ियों से चली आ रही है परंपरा

असुर समुदाय के लोगों का कहना है कि महिषासुर की स्मृति में शोक मनाने की परंपरा उनके कुल और समुदाय में पीढ़ियों से चली आ रही है। वे आज भी इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं।

दशहरे के दौरान मनाई जाने वाली यह परंपरा भारत की सांस्कृतिक विविधता को सामने लाती है। एक ही पर्व और उससे जुड़ी कथाओं को अलग-अलग समुदाय अपनी मान्यताओं और परंपराओं के आधार पर अलग तरह से देखते हैं।


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