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रायपुर में जगन्नाथ रथयात्रा की अनोखी परंपरा, तिजोरी से निकलती हैं दो सोने की झाड़ू, राज्यपाल-CM करते हैं मार्ग की सफाई

रायपुर में जगन्नाथ रथयात्रा की अनोखी परंपरा, तिजोरी से निकलती हैं दो सोने की झाड़ू, राज्यपाल-CM करते हैं मार्ग की सफाई

रायपुर। Jagannath Rath Yatra 2026: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं और आस्था का अनूठा संगम भी है। यहां रथयात्रा के दौरान महाप्रभु के रथ के मार्ग की सफाई साधारण झाड़ू से नहीं, बल्कि करीब सवा किलो वजनी दो सोने की झाड़ुओं से की जाती है। यह विशेष झाड़ू पूरे वर्ष सुरक्षित तिजोरी में रखी जाती हैं और केवल रथयात्रा के दिन ही बाहर निकाली जाती हैं। इस अनूठी परंपरा का सबसे खास हिस्सा 'छेरापहरा' अनुष्ठान है, जिसमें एक सोने की झाड़ू राज्यपाल और दूसरी मुख्यमंत्री के हाथ में होती है। दोनों महाप्रभु के रथ के आगे प्रतीकात्मक रूप से मार्ग की सफाई कर सेवा और समर्पण का संदेश देते हैं।

पुरी की परंपरा को रायपुर में मिला नया स्वरूप

अवंति विहार-गायत्री नगर स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में वर्ष 2003 से पुरी धाम की परंपरा के अनुरूप भव्य रथयात्रा निकाली जा रही है। मंदिर समिति के अध्यक्ष एवं विधायक पुरंदर मिश्रा के अनुसार, ओडिशा के पुरी में जिस प्रकार गजपति महाराज सोने की झाड़ू से भगवान जगन्नाथ के रथ का मार्ग साफ करते हैं, उसी परंपरा को रायपुर में भी अपनाया गया है। रायपुर में इस परंपरा के तहत राजा की भूमिका राज्यपाल और मुख्यमंत्री निभाते हैं। दोनों श्रद्धा और सेवा भाव के साथ 'छेरापहरा' अनुष्ठान संपन्न करते हैं।

पूरे साल तिजोरी में सुरक्षित रहती हैं सोने की झाड़ू

मंदिर समिति के अनुसार दोनों सोने की झाड़ुओं का वजन लगभग सवा किलो है। इन्हें पूरे वर्ष विशेष सुरक्षा के साथ तिजोरी में रखा जाता है और केवल रथयात्रा के दिन धार्मिक अनुष्ठान के लिए बाहर निकाला जाता है। इसी वजह से यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रहती है।

ओडिशा के कलाकार सजा रहे मंदिर और रथ

रथयात्रा की तैयारियों के तहत इस बार भी ओडिशा से आए कलाकार मंदिर परिसर और रथों को पारंपरिक शैली में सजा रहे हैं। मंदिर की दीवारों, प्रवेश द्वार और रथों पर रंग-बिरंगी धार्मिक चित्रकला और पारंपरिक अलंकरण किया जा रहा है, जिससे पूरा परिसर पुरी धाम जैसी आध्यात्मिक छटा बिखेरता नजर आएगा।

पूजा-अर्चना के लिए ओडिशा से पहुंचे पुजारी

रथयात्रा के सभी धार्मिक अनुष्ठानों को शास्त्रसम्मत तरीके से संपन्न कराने के लिए ओडिशा से अनुभवी पुजारियों को भी आमंत्रित किया गया है। उनका उद्देश्य रायपुर आने वाले श्रद्धालुओं को पुरी जैसी आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करना है।

500 साल पुराना है टुरी-हटरी का जगन्नाथ मंदिर

रायपुर की पुरानी बस्ती स्थित टुरी-हटरी का भगवान जगन्नाथ मंदिर शहर के सबसे प्राचीन धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। लगभग 500 वर्ष पुराने इस मंदिर को पहले 'साहूकार मंदिर' के नाम से जाना जाता था। अग्रवाल परिवार द्वारा निर्मित इस मंदिर का अंग्रेजी शासनकाल में विस्तार और सौंदर्यीकरण कराया गया, जिसके बाद यहां भगवान जगन्नाथ की आराधना शुरू हुई और मंदिर की पहचान जगन्नाथ मंदिर के रूप में स्थापित हो गई।

एक ही परिसर में कई देवी-देवताओं के मंदिर

जगन्नाथ मंदिर परिसर में भगवान जगन्नाथ के अलावा श्रीराम दरबार, दो शिव मंदिर, संतोषी माता मंदिर, गरुड़ मंदिर और संकटमोचन हनुमान मंदिर भी स्थापित हैं। यही कारण है कि यह मंदिर पूरे वर्ष श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना रहता है।

आस्था और सेवा का प्रतीक है 'छेरापहरा'

रथयात्रा के दौरान सोने की झाड़ू से मार्ग की सफाई केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं। राजा हो या सामान्य व्यक्ति, सेवा और विनम्रता ही सबसे बड़ा धर्म है। यही भावना 'छेरापहरा' परंपरा को विशेष बनाती है और हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।


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