दिनेश निगम ‘त्यागी’: प्रकरण तेलंगाना का और इसके कारण राज्यसभा के लिए मप्र से दाखिल नामांकन रद्द हो गया। है ना किस्मत का खेल। भाजपा के महेश केवट का भाग्य चमक गया क्योंकि जीतने लायक वोट न होने के बावजूद वे राज्यसभा के सांसद बन गए। दूसरी तरफ मीनाक्षी नटराजन की किस्मत दगा दे गई क्योंकि जीतने लायक वोट होने के बावजूद वे राज्यसभा नहीं पहुंच पाईं। बड़ा सवाल है कि तेलंगाना के इस प्रकरण की जानकारी मप्र के भाजपा नेताओं तक कैसे पहुंची? दरअसल, भाजपा के रणनीतिकार चार कदम आगे चलते और सोचते हैं। भाजपा को मालूम था कि मीनाक्षी तेलंगाना कांग्रेस की प्रभारी हैं। इसलिए तेलंगाना भाजपा को अलर्ट किया गया।
कहा गया कि मीनाक्षी से जुड़ा कोई प्रकरण हो तो जानकारी तत्काल भेजी जाए। भाजपा को कोर्ट में पेश एक प्रकरण की जानकारी मिल गई, जिसमें एक याचिका पर मीनाक्षी को नोटिस मिला था। खबर है कि प्रदेश भाजपा के कुछ नेताओं को इसकी जानकारी मीनाक्षी के नामांकन से पहले ही मिल गई। कांग्रेस विधायकाे को सुरक्षित रखने की तैयारी में जुटी थी और भाजपा आपत्ति लगाने काे तैयार। लिहाजा, नामांकन दाखिल होने के बाद आपत्ति दर्ज कराई गई और मीनाक्षी का नामांकन निरस्त हो गया। अब कांग्रेस कोर्ट-कचहरी के साथ सड़क पर लड़ती रहे, लेकिन राज्यसभा की सीट तो हाथ से निकल गई।
नामांकन मसले पर सबसे ज्यादा गलती मीनाक्षी की....!
कांग्रेस से राज्यसभा की उम्मीदवार घोषित की गईं मीनाक्षी नटराजन बायोकेमिस्ट्री से पोस्ट ग्रेजुएट हैं। उन्होंने लॉ में बैचलर डिग्री हासिल की है। एक बार सांसद रही हैं और दो बार लोकसभा का चुनाव हारी हैं। अर्थात उन्हें नामांकन फार्म भरने और उसे दाखिल करने का पर्याप्त अनुभव है। बावजूद इसके उनका नामांकन रिटर्निंग आफीसर ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि उन्होंने कोर्ट द्वारा जारी किए गए नोटिस की जानकारी नामांकन में नहीं दी। नामांकन में और भी गलतियां बताई गईं हैं, लेकिन उसके खारिज होने का आधार वह नोटिस ही बना। इस गलती का ठीकरा कांग्रेस के उन नेताओं के सिर फोड़ा जा रहा है जो राज्यसभा के लिए दावेदार थे।
ऐसा करना उनके साथ अन्याय है, क्योंकि इसमें किसी की गलती है तो खुद मीनाक्षी की। उनके पास नामांकन भरने का अनुभव है और नोटिस के बारे में जानकारी भी उनके पास ही थी, अन्य किसी के पास नहीं। यदि वे नोटिस का जिक्र करतीं तो नामांकन में उसका उल्लेख किया जाता। इसलिए इस पर तो बहस हो सकती है कि रिटर्निंग आफीसर ने मीनाक्षी का नामांकन रद्द कर सही किया या गलत, क्योंकि मीनाक्षी को नोटिस मिला था, उनके खिलाफ कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं था, लेकिन इसके लिए कांग्रेस के किसी दूसरे नेता के सिर ठीकरा फोड़ना ठीक नहीं।
मीनाक्षी मामले में विवाद का कारण बन गए दिग्विजय....
कांग्रेस का कोई मसला हो और उसके केंद्र में दिग्विजय सिंह न आए, यह कैसे संभव है? राज्यसभा के लिए मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के मामले में भी यही हुआ। एक तरह पूरी पार्टी नामांकन काे गलत तरीके से रद्द करने के खिलाफ भोपाल से लेकर दिल्ली तक लड़ाई लड़ रही है, दूसरी तरफ दिग्विजय समर्थक उनके अपमान को लेकर कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी पर निशाना साध रहे हैं। नामांकन रद्द होने के बाद प्रेस कांफ्रेंस पार्टी की एकजुटता दिखाने के लिए बुलाई गई थी, लेकिन यहां से कांग्रेस के अंदर तनातनी शुरू हो गई। हुआ यह कि कांफ्रेंस के दौरान दिग्विजय ने कहा कि जेपी धनोपिया को नामांकन के बारे में वस्तुस्थिति बताने दीजिए लेकिन प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने कह दिया कि हो गया। अब इसकी जरूरत नहीं।
दिग्विजय ने दो-तीन बार कहा लेकिन चौधरी नहीं माने। इस बीच जीतू पटवारी ने दिग्विजय से अपनी बात रखने का आग्रह किया तो उन्होंने बोलने से इंकार कर हाथ जोड़ लिए। पूरी मामले को दिग्विजय के अपमान से जोड़ दिया गया। समर्थकों ने कहा कि उनका अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस तरह नामांकन की लड़ाई एक तरफ हो गई और दिग्विजय का अपमान बड़ा मुद्दा बन गया। सवाल है कि प्रदेश में ऐसे कैसे खड़ी हो पाएगी कांग्रेस? क्या मौजूदा प्रदेश नेतृत्व सभी को एकजुट कर पाने में असफल है?
‘आ बैल मुझे मार’ की तर्ज पर अपने सिर ले लिया पंगा....
दिग्विजय सिंह का विवादों से चोली-दामन जैसा साथ दिखता है। एक विवाद खत्म नहीं होता, दूसरा शुरू हो जाता है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के साथ शुरू हुआ उनका विवाद ठंडा भी नहीं पड़ा और उन्होंने एक नए विवाद को जन्म दे दिया। दिग्विजय ने कह दिया कि भाजपा के महेश केवट को राज्यसभा भेजने में भाजपा, निर्वाचन आयोग के साथ सुप्रीम कोर्ट भी शामिल दिखता है। उनका तर्क था कि यह तथ्य रखने के बावजूद कि यदि 3 बजे तक सुनवाई न हुई तो भाजपा का प्रत्याशी निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया। दिग्विजय के इस बयान के बाद बवाल मच गया। भाजपा ने उन पर चौतरफा हमला बोल दिया।
कहा गया कि दिग्विजय 10 साल मुख्यमंत्री रहे हैं, वे सुप्रीम कोर्ट के बारे में ऐसा कैसे बोल सकते हैं? पर दिग्विजय ने यह विवाद ‘आ बैल मुझे मार’ की तर्ज पर अपने सिर ले लिया। इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने एडवोकेट जनरल को पत्र लिख कर दिग्विजय के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करने को कहा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से भी स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है। मजेदार बात यह है कि दिग्विजय ने पुष्यमित्र को फोन कर कहा कि आपने ठीक किया। अब मैं सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी बात रख सकूंगा। लगता है कि दिग्विजय को विवादों में बने रहने में मजा आता है।
केवट की जीत को लेकर भाजपा भी नहीं थी आश्वस्त....!
मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा के लिए दाखिल नामांकन रद्द होने पर कांग्रेस आंदोलित थी ही, भाजपा भी महेश केवट की जीत को लेकर आश्वस्त नहीं थी। इसीलिए जब केवट का नामांकन दाखिल हुआ तब भाजपा के सभी प्रमुख नेता मौजूद थे लेकिन जब निर्वाचित होने का प्रमाण पत्र लेने की बारी आई, तब प्रत्याशियों के साथ प्रदेश भाजपा मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल के अलावा अन्य कोई बड़ा नेता मौजूद नहीं था। केवट के जीत के प्रति आश्वस्त न होने का ही नतीजा था कि निर्वाचित होने का प्रमाण पत्र मिलने के बावजूद भाजपा ने उस दिन जीत का जश्न नहीं मनाया।
इसके लिए सुप्रीम फैसले का इंतजार किया गया। आशंका थी कि सुप्रीम काेर्ट मीनाक्षी का नामांकन वैध करने का निर्णय न दे दे। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी की याचिका यह कह कर सुनने से इंकार कर दिया कि इससे नई परंपरा शुरू हो जाएगी। इसके बाद ही निर्वाचित तीनों नेता भाजपा के प्रदेश मुख्यालय पहुंचे। वहां मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित सभी प्रमुख नेता मौजूद थे। उनका जोरदार स्वागत हुआ, ढोल-नगाड़े बजे, आतिशबाजी हुई और जोश के साथ जश्न मना। आखिर, जीत के लिए पर्याप्त वोट न होने के बावजूद भाजपा का तीसरा प्रत्याशी राज्यसभा पहुंच रहा था, एेसे में आशंका स्वाभाविक थी।