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"मंच पर फटकार, सोशल मीडिया पर प्रचार, क्या सार्वजनिक डांट से सुधरेगी व्यवस्था?" कांग्रेस ने उठाए सवाल

"मंच पर फटकार, सोशल मीडिया पर प्रचार, क्या सार्वजनिक डांट से सुधरेगी व्यवस्था?" कांग्रेस ने उठाए सवाल

छत्तीसगढ़ में चल रहे सुशासन तिहार के दौरान जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों के बीच संवाद के कई वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इन वीडियो में भाजपा के सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों से अधिकारियों और कर्मचारियों से जवाब-तलब करते दिखाई दे रहे हैं। कुछ मामलों में अधिकारियों को कड़ी चेतावनी भी दी गई है। इन घटनाओं ने अब एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या जनता के सामने अधिकारियों को फटकारना सुशासन का हिस्सा है या फिर यह राजनीतिक छवि निर्माण का नया तरीका बनता जा रहा है।

जवाबदेही बनाम सार्वजनिक अपमान

सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और जनता की शिकायतों के समाधान के लिए जवाबदेही जरूरी मानी जाती है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी से गलती हुई है तो उसकी समीक्षा प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए या सार्वजनिक मंच पर। आलोचकों का कहना है कि जवाबदेही तय करना अलग बात है, लेकिन किसी कर्मचारी को हजारों लोगों के सामने कठघरे में खड़ा करना उसकी गरिमा को प्रभावित कर सकता है।

सोशल मीडिया के दौर में बदलती राजनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने नेताओं की कार्यशैली में भी बदलाव लाया है। अब ऐसे वीडियो, जिनमें जनप्रतिनिधि अधिकारियों पर सख्ती दिखाते नजर आते हैं, तेजी से वायरल होते हैं और जनता के बीच उनकी सक्रिय छवि प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि कई मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई से ज्यादा चर्चा वीडियो क्लिप और सोशल मीडिया पोस्ट की होने लगती है।

कर्मचारियों के सम्मान का भी सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के पीछे उसका परिवार भी जुड़ा होता है। सार्वजनिक मंच पर हुई फटकार या अपमान के वीडियो केवल उस कर्मचारी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसके परिवार, बच्चों और समाज तक पहुंचते हैं। ऐसे में यह बहस भी उठ रही है कि प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखने और व्यक्तिगत सम्मान के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।

कर्मचारी संगठनों ने जताई नाराजगी

इस मुद्दे पर कर्मचारी संगठनों ने भी चिंता व्यक्त की है। कर्मचारी प्रतिनिधियों का कहना है कि सरकारी कर्मचारी सरकार की योजनाओं को जमीन पर लागू करने का काम करते हैं और यदि किसी स्तर पर कमी पाई जाती है तो उसके लिए निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया मौजूद है। उनका मानना है कि सार्वजनिक मंचों से कर्मचारियों को फटकारना उनके मनोबल को कमजोर कर सकता है।

विपक्ष ने साधा सरकार पर निशाना

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि किसी अधिकारी ने लापरवाही बरती है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन सार्वजनिक रूप से अपमानित करना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं माना जा सकता। विपक्ष का आरोप है कि कई बार ऐसे कार्यक्रम राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बन जाते हैं।

भाजपा ने किया बचाव

दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी जनता की समस्याओं का समाधान सुनिश्चित करना है। पार्टी नेताओं के मुताबिक यदि किसी अधिकारी की लापरवाही के कारण जनता परेशान होती है तो जनप्रतिनिधियों का हस्तक्षेप स्वाभाविक है। उनका तर्क है कि जनता ने उन्हें समस्याओं के समाधान के लिए चुना है और वे अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

लोकतंत्र में जवाबदेही और सम्मान दोनों जरूरी

वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रशासनिक जवाबदेही लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ सम्मानजनक व्यवहार भी उतना ही जरूरी है। उनका कहना है कि कार्रवाई का अधिकार कानून और नियमों के तहत मौजूद है, इसलिए किसी भी प्रक्रिया में संवेदनशीलता और गरिमा बनाए रखना आवश्यक है।

बहस का केंद्र बना सुशासन तिहार

फिलहाल सुशासन तिहार का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है, लेकिन अधिकारियों को सार्वजनिक मंचों से फटकारने की घटनाओं ने पूरे कार्यक्रम को नई बहस के केंद्र में ला दिया है। अब चर्चा इस बात पर हो रही है कि क्या सुशासन का मतलब केवल सख्ती दिखाना है या फिर ऐसी व्यवस्था तैयार करना भी है जिसमें जवाबदेही के साथ-साथ सम्मान और संवेदनशीलता भी बनी रहे।


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