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Orchha News: ओरछा में प्रिया-प्रियतम मिलन महोत्सव का महा-समापन

Orchha News: ओरछा में प्रिया-प्रियतम मिलन महोत्सव का महा-समापन

हेमंत गोस्वामी, ओरछा: बुंदेलखंड की अयोध्या कही जाने वाली पावन नगरी ओरछा के ऐतिहासिक कनक भवन मंदिर में चल रहे भव्य सात दिवसीय प्रिया-प्रियतम मिलन महोत्सव की पूर्णाहुति हो गई है। अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य महाराज के मुखारविंद से प्रवाहित हो रही दिव्य भागवत ज्ञान गंगा के विश्राम दिवस पर भक्तों का जनसैलाब लाइव उमड़ पड़ा। विश्राम दिवस की कथा सुबह 5 बजे से आरंभ हुई, जिसमें महाराज श्री ने सनातन धर्म, पारिवारिक मर्यादा और समाज में फैली कुप्रथाओं की कतरन पर अब तक का सबसे शास्त्रीय उपदेश दिया है।

शरीर रहते हो साक्षात्कार

महाराज ने कहा हमें अपने आप को विधिक रूप से परमात्मा से जोड़ना है। भगवान से जुड़ने का सीधा मतलब यह है कि इसी जन्म में और इसी नश्वर शरीर से हमें भगवत साक्षात्कार हो। हृदय में केवल प्रभु प्रेम बढ़ाने की एकमात्र कामना होनी चाहिए, इसके अलावा संसार की कोई दूसरी इच्छा शेष न रहे। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य को संसार में केवल वही कार्य और कामनाएं करनी चाहिए जो शास्त्र, धर्म और सामाजिक मर्यादा से अनुकूल हों। जो कार्य धर्म के विरुद्ध हो, उसे स्वप्न में भी करने का विचार मन में नहीं लाना चाहिए।

धन पिशाचों पर प्रहार

भगवान श्री कृष्ण रुक्मिणी विवाह प्रसंग की कथा सुनाते हुए स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य महाराज ने समाज में फैली दहेज की कुप्रथा पर कड़ा रुख अख्तियार किया। महाराज ने भावुक होते हुए कहा कि वर्तमान में विवाह में दहेज की मांग इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि एक पिता अपनी बेटी की शादी करते-करते पूरी तरह कर्जदार हो जाता है। ऐसे धन के लोभी और धन पिशाचों के घर में अपनी कन्या का विवाह कदापि नहीं करना चाहिए, जिनके लालच की वजह से अतीत में न जाने कितनी नारियों को जला दिया गया। इससे बेहतर है कि किसी साधनहीन लेकिन सज्जन परिवार में बेटी का विवाह कर, अपने धन से उस परिवार को साधन संपन्न बना दिया जाए।

चल और अचल संपत्ति का शास्त्रीय नियम

महाराज ने वर्तमान कानून और शास्त्रों की तुलना करते हुए एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि पिता की संपत्ति पर बेटे और बेटी का समान अधिकार है, आज का कानून भी यही कहता है लेकिन उसका स्वरूप शास्त्रीय नहीं है। शास्त्रों के अनुसार, पिता की संपत्ति के दो स्वरूप होते हैं चल और अचल। चल संपत्ति गहने, कपड़े, धन पुत्री को विवाह के समय उपहार स्वरूप दी जाती थी, जबकि अचल संपत्ति जमीन, मकान पुत्रों को प्राप्त होती थी। आज लोगों ने इसका स्वरूप बदलकर इसे कुप्रथा बना दिया है।

महोत्सव के समापन पर महाराज ने सुखी जीवन का सूत्र देते हुए कहा कि जो लोग धर्म के मार्ग पर चलकर धन कमाते हैं, मर्यादा पूर्वक समय पर विवाह संस्कार कर स्त्री के साथ यज्ञ-आराधना में धन का सदुपयोग करते हैं, उनके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही सुखद स्थान बन जाते हैं। इसके विपरीत, जो लोग विद्या, तप और दान को छोड़कर क्षणिक तामसी सुखों के पीछे भागते हैं, उन्हें दोनों लोकों में केवल विधिक दुःख ही प्राप्त होता है। बुद्धिमान वही कप्तान है जो दोनों लोकों को सुधारे और यदि अनजाने में कोई पाप हो जाए तो उसका प्रायश्चित करे।

24 जून को कथा के भव्य विश्राम के बाद सुरभि गोवंश सेवा एवं पर्यावरण संरक्षण संस्थान ओरछा द्वारा विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। आयोजन समिति ने महोत्सव को सफल बनाने वाले देश-विदेश से आए सभी भक्तों का आभार व्यक्त किया।


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