इंदौर। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में हाईकोर्ट को सौंपी गई वन-मैन जांच रिपोर्ट ने नगर निगम और इंदौर विकास प्राधिकरण की 30 साल की लापरवाही को उजागर किया है। रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की 112 पेज की फाइनल रिपोर्ट में कहा गया है कि यह हादसा एक दिन की गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की सामूहिक नाकामी है।
73 में से 54 सैंपल फेल
INH को मिली एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक 2023-24 में पानी के सैंपल मानकों पर खरे थे, लेकिन हादसे के वक्त 30 दिसंबर 2025 को लिए गए 73 में से 54 सैंपल फेल पाए गए। 39 सैंपलों में फेकल कोलीफॉर्म (मल में पाया जाने वाला बैक्टीरिया) मिला है, जो सीधे तौर पर गटर का पानी पीने के पानी में मिलने का प्रमाण है।
जांच आयोग ने चार स्तर पर जिम्मेदारी तय की है -
(1) 1990-2004 में सीवरेज और वाटर लाइन बिछाने वाले IDA के तत्कालीन अफसर जिन्होंने नियमों का उल्लंघन किया
(2) मेंटेनेंस में लापरवाही बरतने वाले नगर निगम के जोनल अफसर
(3) जोन-4 में 8 साल तक पदस्थ रहे असिस्टेंट इंजीनियर सरोज कुमार प्रजापति
(4) 2013 से 2026 तक पदस्थ रहे सुपरिटेंडेंट इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव, जिन्होंने पाइपलाइन बदलने के टेंडर में जानबूझकर देरी की।
रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम को पाइपलाइन की जर्जर हालत की जानकारी थी, टेंडर की प्रक्रिया भी शुरू हुई थी, लेकिन बार-बार कैंसिल और लेटलतीफी के कारण काम समय पर नहीं हुआ।
मुआवजा की राशि बढ़ाने की सिफारिश
आयोग ने मुआवजे पर भी सख्त टिप्पणी की है। वर्तमान में मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख दिए गए हैं, जबकि रायचूर जल प्रदूषण केस में 5 लाख और ब्यास नदी हादसे में 20 लाख प्रति परिवार मुआवजा दिया गया था। आयोग ने सिफारिश की है कि पब्लिक लॉ कंपंसेशन के तहत मृतकों के परिजनों को 5 से 20 लाख, गंभीर बीमारों को 1 से 5 लाख और मामूली बीमारों को 50 हजार से 1 लाख तक मुआवजा दिया जाए।
रिपोर्ट में आगे विभागीय जांच और निगम की पूरी वाटर सप्लाई व्यवस्था के ऑडिट की भी सिफारिश की गई है।