नई दिल्ली। राष्ट्रपति भवन स्थित सांस्कृतिक केंद्र में गुरुवार को छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति और परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष सम्मान मिला। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं, पारंपरिक जनप्रतिनिधियों, पद्मश्री सम्मानित हस्तियों और विभिन्न जनजातीय समुदायों के कुल 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से शिष्टाचार मुलाकात की। इस दौरान राष्ट्रपति ने प्रतिनिधिमंडल का गर्मजोशी से स्वागत किया और उनके साथ आत्मीय संवाद भी किया।
बस्तर पंडुम को बताया सांस्कृतिक विरासत का मजबूत माध्यम
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि बस्तर पंडुम जैसे आयोजन जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपराओं और लोक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से पर्यटन को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी तैयार होते हैं।
बस्तर दशहरा में शामिल होने की जताई इच्छा
राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा को देश की अनूठी सांस्कृतिक पहचान बताते हुए भविष्य में इस आयोजन में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बस्तर क्षेत्र में विकास और शांति की दिशा में हो रहे बदलाव प्रेरणादायक हैं। साथ ही उन्होंने मांझी-चालकी व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि यह व्यवस्था समाज और प्रशासन के बीच मजबूत संवाद स्थापित करती है।
CM विष्णुदेव साय ने दिया बस्तर आने का निमंत्रण
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति को बस्तर की लगभग 300 वर्ष पुरानी 'झिटकू-मिटकी' लोकगाथा पर आधारित कलाकृति भेंट की। उन्होंने राष्ट्रपति को बस्तर आने और बस्तर दशहरा सहित जनजातीय सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण भी दिया।
अमित शाह ने बताया ऐतिहासिक अवसर
कार्यक्रम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति भवन में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में बस्तर के पारंपरिक परिधानों में जनजातीय प्रतिनिधिमंडल पहुंचा है। उनके अनुसार यह केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की जनजातीय संस्कृति के लिए गर्व का क्षण है।
राष्ट्रपति भवन का किया भ्रमण
सम्मान समारोह के बाद प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति भवन के विभिन्न हिस्सों का भ्रमण भी किया। इस आयोजन के माध्यम से बस्तर की कला, संस्कृति, लोक परंपरा और जनजातीय विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। राज्य सरकार ने इसे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।