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CBSE OSM Tender: CBSE के OSM Tender का असली सच क्या? क्यों बदले ब्लैकलिस्टिग नियम?

CBSE OSM Tender: CBSE के OSM Tender का असली सच क्या? क्यों बदले ब्लैकलिस्टिग नियम?

CBSE OSM Tender: देश की सबसे बड़ी परीक्षा संस्था, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड CBSE इन दिनों एक बड़े विवादों में फंस गई है। साल 2025 के 131 पन्नों के आधिकारिक टेंडर दस्तावेजों से एक ऐसा राजफाश हुआ है, जिसने शिक्षा जगत में हड़कंप मचा दिया है। खुलासा हुआ है कि बोर्ड ने डिजिटल स्कैनिंग और ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन का ठेका फाइनल करने से ठीक पहले नियमों में एक बड़ा फेरबदल किया था। इस बदलाव के तहत गड़बड़ी करने वाली कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए जो ब्लैकलिस्टिंग का सबसे सख्त हथियार था, उसे ही टेंडर से हमेशा के लिए गायब कर दिया गया।

विवाद बढ़ा तो CBSE ने दी सफाई

इस पूरे मामले के मीडिया में आने और बवाल मचने के बाद सीबीएसई ने आधिकारिक तौर पर अपनी चुप्पी तोड़ी है। बोर्ड ने यह स्वीकार किया है कि शुरुआत में जारी किए गए मुख्य टेंडर में ब्लैकलिस्टिंग का कड़ा प्रावधान शामिल किया गया था। बोर्ड की सफाई के मुताबिक, थर्ड-पार्टी सर्विस प्रोवाइडर कंपनी टीसीएस ने इस क्लॉज को हटाने की सिफारिश या अनुरोध किया था। इसी के बाद एक सुधार-पत्र जारी करके इस नियम को टेंडर से हटा दिया गया। खुद का बचाव करते हुए सीबीएसई का कहना है कि भले ही तकनीकी रूप से टेंडर से यह क्लॉज हटा दिया गया हो, लेकिन बोर्ड के पास यह अधिकार हमेशा सुरक्षित रहता है कि वह किसी भी दोषी वेंडर के खिलाफ भविष्य में ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई कर सके।

नतीजों के बाद फूटा OSM सिस्टम का घड़ा

यह पूरा विवाद तब खुलकर सामने आया जब हाल ही में 13 मई 2026 को कक्षा 12वीं का रिजल्ट घोषित हुआ। रिजल्ट आते ही ऑनलाइन ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम की सुरक्षा में कमियां उजागर हो गईं। आरोप है कि कॉपियों की डिजिटल स्कैनिंग का जिम्मा संभाल रही कंपनी के सर्वर से परीक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारियां और छात्रों का डेटा लीक हो गया। सुरक्षा में चूक और कामकाज के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये के बाद हैदराबाद की कंपनी कोएम्प्ट एडू टेक पूरी तरह से जांच के घेरे में आ गई है, जिसे सीबीएसई ने लाखों आंसर शीट्स के मूल्यांकन का ठेका दिया था।

समझें खेल, कैसे पलटे नियम 

दस्तावेजों की कड़ियां साफ तौर पर बयां करती हैं कि कॉन्ट्रैक्ट साइन होने से ठीक पहले नियमों को किस तरह बेहद लचीला और कंपनी-फ्रेंडली बनाया गया। सीबीएसई ने कॉपियों के ई-इवैल्यूएशन के लिए पहला टेंडर निकाला। इसमें साफ तौर पर प्रावधान था कि अगर वेंडर से कोई चूक होती है या वह नियमों का बार-बार उल्लंघन करता है, तो उसे कारण बताओ नोटिस दिया जाएगा, उसका सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त होगा और कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया जाएगा।

महज एक महीने के अंदर बोर्ड ने अचानक एक शुद्धि-पत्र जारी कर दिया। इसके जरिए ब्लैकलिस्टिंग के प्रावधान को टेंडर से साफ कर दिया गया। अब बोर्ड के पास केवल जुर्माना लगाने या ठेका रद्द करने का अधिकार बचा, वेंडर के हमेशा के लिए प्रतिबंधित होने का डर खत्म हो गया।

05 दिसंबर 2025 (ठेका आवंटित)

ब्लैकलिस्टिंग का खौफ पूरी तरह खत्म होते ही, यह संवेदनशील और करोड़ों रुपये का ठेका हैदराबाद की कंपनी कोएम्प्ट एडू टेक की झोली में डाल दिया गया। नियमों के इस खेल के बाद जो फाइनल एग्रीमेंट साइन हुआ, उसमें कंपनी के लिए बैन होने का खतरा तो टल गया, लेकिन उसकी जगह केवल वित्तीय जुर्माने का एक अनोखा और कमजोर क्लॉज जोड़ दिया गया। यदि कोई तकनीकी खराबी आती है और वेंडर उसे तय समय पर ठीक नहीं कर पाता, तो हर 15 मिनट की देरी पर उस पर 1 लाख रुपये की पेनाल्टी लगाई जाएगी। किसी बड़ी तकनीकी चूक के मूल कारण का सुधारात्मक एक्शन प्लान जमा करने में यदि वेंडर हर 60 मिनट की देरी करता है, तो प्रति घंटे के हिसाब से 1 लाख का आर्थिक दंड लगेगा। बेहद असाधारण और गंभीर परिस्थितियों में ही बोर्ड को सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त करने और अनुबंध निरस्त करने का अधिकार दिया गया।

उठते सवाल...

टेंडर के मूल दस्तावेजों में इस बात का कहीं कोई ठोस उल्लेख नहीं है कि आखिर किस आधार पर देश के करोड़ों छात्रों की कॉपियों की प्राइवेसी को ताक पर रखकर यह क्लॉज हटाया गया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महज कुछ लाख रुपये की पेनाल्टी लगाकर देश की इतनी बड़ी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है?


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