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52 शक्तिपीठों में शामिल है ज्वालाजी का मंदिर: जहां पर दिन-रात जलती है ज्वाला, अंग्रेज भी नहीं पता लगा पाए इसका रहस्य... 

52 शक्तिपीठों में शामिल है ज्वालाजी का मंदिर: जहां पर दिन-रात जलती है ज्वाला, अंग्रेज भी नहीं पता लगा पाए इसका रहस्य... 

52 Shaktipeeths 3 Jwala Devi: माता सती के 52 शक्तिपीठों में से एक ज्वालाजी का मंदिर है. माता का यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले की कालीधार पहाड़ी में स्थित है. आपको बता दें कि, ज्वाला मंदिर को नगरकोट के मंदिर और जोता वाली मां का मंदिर के नाम से भी काफी प्रसिद्ध है. दरअसल इस मंदिर में किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि पृथ्वी से निकल रही नौ प्राकृतिक ज्वालाओं की पूजा होती है. 

इस राजा ने करवाया था मंदिर का निर्माण: 

इन 9 ज्योतियों को अन्नपूर्णा, महाकाली, हिंगलाज, चंडी, महालक्ष्मी, विंध्यवासिनी, सरस्वती, अंजीदेवी, अंबिका के नाम से जाना जाता है. इन सभी ज्वालाओं में ज्वाला महाकाली सबसे प्रमुख रूप में मानी जाती है. यह मंदिर जितना अद्भुत और दिव्य है, उतना ही चमत्कारिक भी मानी जाती है. मान्यता है कि माता सती की यहां पर जिह्वा गिरी थी.जानकारी के मुताबिक राजा भूमि चंद ने मां ज्वाला देवी के मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसके बाद 1835 में राजा संसार चंद और महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर का पुननिर्माण करवाया था. 

मंदिर की धार्मिक कथा:

कहा जाता है कि बादशाह अकबर इस मंदिर के बारे में सुनकर हैरान हो गए थे और मंदिर की तरफ सेना लेकर खुद चल पड़े। इन ज्वालाओं को बादशाह अकबर ने बुझाने का प्रयास किया था. इतना नहीं उन्होंने इन ज्वालाओं को देखकर उसे बुझाने के लिए नहर तक बनवाई थी, लेकिन उनके लाख  प्रयास करने के बाद भी वह इस मकसद में सफल नहीं हो पाए.

मां ने नहीं किया स्वीकार सोने का छत्र: 

लेकिन उनके लाख  प्रयास करने के बाद भी वह इस मकसद में सफल नहीं हो पाए, और आखिर में अकबर ने भी देवी मां की महिमा के आगे घुटने टेक दिया, और मां के दरबार में सवा मन यानी पचास किलो सोने का छत्र चढ़ाया। लेकिन माता ने इस भेंट को स्वीकार ही नहीं किया। और छत्र गिर कर दूसरे अन्य धातु में परिवर्तित हो गया।  वह छत्र आज भी ज्वाला देवी के मंदिर में रखा हुआहै।

अंग्रेज भी नहीं जा पाए इसका रहस्य:

वहीं अंग्रेजों ने इसके बाद इन ज्वालाओं के जलने का रहस्य जानने की कोशिश की थी लेकिन वो भी ऐसा करने में असफल रहे. बता दें कि जमीन अंदर से निकलती इस ऊर्जा का अंग्रेज भी इस्तेमाल करने की कोशिश करना चलते थे, लेकिन लाख प्रयास  करने के बाद भी भूगर्भ से निकलती इस ज्वाला का अंग्रेज पता नहीं कर पाए, और यह मान लिया कि, यह ज्योत प्राकृति नहीं चमत्कारिक कारणों से लगातार जल रही है।


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