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बद्रीनाथ मंदिर में भगवान को क्यों ओढ़ाया जाता है घी से लेपित कंबल? जानिए क्या है सदियों पुरानी मान्यता

बद्रीनाथ मंदिर में भगवान को क्यों ओढ़ाया जाता है घी से लेपित कंबल? जानिए क्या है सदियों पुरानी मान्यता

Badrinath Dham News: उत्तराखंड के प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम में भगवान बदरीविशाल को शीतकाल के दौरान घृत कंबल ओढ़ाने की परंपरा श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती है। इस विशेष कंबल को चमोली जिले के सीमांत गांव माणा की महिलाएं और बेटियां तैयार करती हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, पारिवारिक विरासत और भगवान के प्रति वात्सल्य भाव का भी प्रतीक है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बद्रीनाथ मंदिर के कपाट सर्दियों के लिए बंद होने से पहले तैयार किए गए इस कंबल पर शुद्ध देसी घी और केसर का लेप लगाया जाता है। इसके बाद मंदिर के मुख्य पुजारी भगवान बदरीविशाल के विग्रह को घृत कंबल से ढकते हैं। मान्यता है कि शीतकाल के छह महीनों में भगवान इसी कंबल में विराजमान रहते हैं।

माणा गांव की महिलाओं और बेटियों के हाथों तैयार होता है कंबल

घृत कंबल बनाने की प्रक्रिया इस परंपरा को खास बनाती है। इसे तैयार करने के लिए मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि माणा गांव की महिलाएं और युवतियां सामूहिक रूप से इसे बनाती हैं। परंपरा के अनुसार, कार्तिक महीने में निर्धारित शुभ अवसर पर सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं व्रत रखती हैं और एक ही दिन में कंबल तैयार करती हैं। इस वर्ष भी माणा गांव के मोल्फा परिवार की ओर से एकादशी के अवसर पर घृत कंबल और पहाड़ी गाय का शुद्ध देसी घी भगवान बदरीविशाल को अर्पित किया गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, जानवी मोल्फा, रिद्धिमा मोल्फा, आरोही मोल्फा और सृष्टि मोल्फा ने कंबल तैयार करने में योगदान दिया। इस अनुष्ठान के पीछे भगवान के प्रति सेवा और समर्पण का भाव जुड़ा हुआ है। जिस तरह परिवार के सदस्य सर्दियों में अपने बच्चों को ठंड से बचाने की चिंता करते हैं, उसी तरह श्रद्धालु भगवान को कंबल अर्पित करके अपना स्नेह व्यक्त करते हैं।

आदि गुरु शंकराचार्य के समय से जुड़ी मानी जाती है परंपरा

घृत कंबल की परंपरा को लेकर स्थानीय लोगों में गहरी आस्था है। मान्यता है कि इसका संबंध आदि गुरु शंकराचार्य के समय से रहा है। माणा गांव के पूर्व प्रधान पीतांबर मोल्फा के अनुसार, उनके गांव के परिवारों को पीढ़ियों से भगवान बद्रीनाथ के लिए यह विशेष कंबल तैयार करने और अर्पित करने की जिम्मेदारी मिलती रही है। यही वजह है कि इस परंपरा को केवल एक धार्मिक रस्म के रूप में नहीं देखा जाता। यह माणा के परिवारों के लिए पूर्वजों से मिली सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।
 



कपाट बंद होने से पहले भगवान को ओढ़ाया जाता है घृत कंबल

हिमालय की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ धाम में सर्दियों के दौरान तापमान काफी नीचे चला जाता है। बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के बीच मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद किए जाते हैं। इसी अवसर पर घृत कंबल अर्पित करने की रस्म पूरी होती है। परंपरा के मुताबिक, मंदिर के मुख्य पुजारी यानी रावल कंबल पर शुद्ध घी और केसर का लेप लगाते हैं। इसके बाद भगवान बदरीविशाल के विग्रह को कंबल ओढ़ाया जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, कपाट बंद रहने की अवधि में भगवान इसी कंबल से आच्छादित रहते हैं। यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए भगवान के प्रति अपनत्व और वात्सल्य प्रकट करने का माध्यम है। इसमें कंबल केवल ठंड से बचाव का प्रतीक नहीं, बल्कि भक्तों की भावनाओं और आस्था से जुड़ा एक विशेष प्रसाद भी है।

छह महीने बाद कंबल से जुड़े प्रसाद की होती है मान्यता

बद्रीनाथ धाम के कपाट दोबारा खुलने पर घृत कंबल को भगवान के विग्रह से उतारा जाता है। इसके बाद परंपरा के अनुसार कंबल के छोटे-छोटे टुकड़े श्रद्धालुओं को महाप्रसाद के रूप में दिए जाते हैं। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, कंबल पर लगा घी यदि छह महीने बाद भी ताजा और नम दिखाई दे, तो इसे अच्छी वर्षा, खुशहाली और समृद्धि का संकेत माना जाता है। हालांकि, यह आस्था से जुड़ी मान्यता है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मौसम पूर्वानुमान नहीं। इस परंपरा का इंतजार माणा गांव के लोगों के साथ-साथ बद्रीनाथ धाम से जुड़े श्रद्धालुओं को भी रहता है। कंबल अर्पित करने से लेकर उसे प्रसाद के रूप में प्राप्त करने तक की पूरी प्रक्रिया में धार्मिक विश्वास और सदियों से चली आ रही परंपरा की झलक दिखाई देती है।

माणा गांव की संस्कृति और बद्रीनाथ धाम का गहरा रिश्ता

चमोली जिले में भारत-चीन सीमा के निकट स्थित माणा गांव अपनी भौगोलिक स्थिति, लोकजीवन और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। बद्रीनाथ धाम से इसका धार्मिक और भावनात्मक जुड़ाव काफी पुराना है। यहां के परिवार मंदिर से संबंधित परंपराओं को अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं। मोल्फा परिवार के लिए घृत कंबल तैयार करना पूर्वजों से मिली जिम्मेदारी को आगे बढ़ाने जैसा है। इस काम में महिलाओं और बेटियों की भागीदारी यह भी दिखाती है कि पहाड़ों की कई धार्मिक परंपराएं परिवारों और समुदायों के सामूहिक प्रयास से जीवित रहती हैं। भगवान बदरीविशाल को घृत कंबल ओढ़ाने की परंपरा बद्रीनाथ धाम की धार्मिक संस्कृति का अनूठा उदाहरण है। माणा गांव की महिलाओं और बेटियों की मेहनत, परिवारों की आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत इस परंपरा को विशेष बनाती है। यह अनुष्ठान बताता है कि उत्तराखंड की धार्मिक पहचान केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि वहां के लोगों की जीवनशैली और भावनाओं में भी गहराई से समाई हुई है।


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