होम
देश
दुनिया
राज्य
खेल
अध्यात्म
मनोरंजन
सेहत
जॉब अलर्ट
जरा हटके
फैशन/लाइफ स्टाइल

 

गरीब और आदिवासी ग्रामीणों के पक्ष में हाईकोर्ट का अहम निर्णय, पुनरीक्षण याचिका पर होगी दोबारा सुनवाई

गरीब और आदिवासी ग्रामीणों के पक्ष में हाईकोर्ट का अहम निर्णय, पुनरीक्षण याचिका पर होगी दोबारा सुनवाई

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि गरीब, आदिवासी और निरक्षर ग्रामीणों को केवल तकनीकी कारणों या याचिका दायर करने में हुई देरी के आधार पर न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि सुदूर वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोग अक्सर अपने मामलों में पूरी तरह अधिवक्ताओं पर निर्भर रहते हैं, इसलिए उनकी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

राजस्व मंडल का आदेश हुआ निरस्त

जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने छत्तीसगढ़ राजस्व मंडल, बिलासपुर द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के सात ग्रामीणों की विलंब से दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए राजस्व मंडल को भेजते हुए निर्देश दिया है कि सभी पक्षों को सुनकर गुण-दोष के आधार पर नया फैसला लिया जाए।

भूमि बेदखली कार्रवाई से जुड़ा है पूरा मामला

यह मामला बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के मरियमपारा गांव निवासी 68 वर्षीय कोदिया उरांव और अन्य ग्रामीणों से जुड़ा है। ग्रामीण वर्षों से जिस भूमि पर मकान बनाकर रह रहे थे, वहां से बेदखली की कार्रवाई तहसीलदार द्वारा शुरू की गई थी। इस कार्रवाई के खिलाफ ग्रामीणों ने संभाग आयुक्त न्यायालय में अपील दायर की थी, लेकिन 21 जुलाई 2025 को आयुक्त न्यायालय ने तहसीलदार के आदेश को सही मानते हुए अपील खारिज कर दी थी।

जनवरी 2026 में मिली आदेश की जानकारी

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे दूरस्थ वनांचल क्षेत्र के निवासी और निरक्षर हैं। उन्हें आयुक्त न्यायालय के आदेश की जानकारी समय पर नहीं मिल सकी। जनवरी 2026 में जब प्रशासन मकानों को हटाने पहुंचा, तब उन्हें मामले की जानकारी हुई। इसके बाद ग्रामीणों ने आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर छत्तीसगढ़ राजस्व मंडल में पुनरीक्षण याचिका दायर की और देरी माफ करने का आवेदन भी प्रस्तुत किया।

राजस्व मंडल ने बताया था लापरवाही

राजस्व मंडल ने 9 मार्च 2026 को आवेदन खारिज करते हुए कहा था कि ग्रामीणों ने अपने अधिवक्ता से मामले की स्थिति जानने का प्रयास नहीं किया, जो उनकी लापरवाही को दर्शाता है। इसी आदेश को चुनौती देते हुए ग्रामीण हाईकोर्ट पहुंचे थे।

न्याय का उद्देश्य अधिकारों की रक्षा है: हाईकोर्ट

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि वे गरीब, आदिवासी और निरक्षर लोग हैं तथा पूरी तरह अपने वकील पर निर्भर थे। जैसे ही उन्हें बेदखली की कार्रवाई की जानकारी मिली, उन्होंने तत्काल कानूनी कदम उठाए। दूसरी ओर, राज्य शासन ने दलील दी कि सात महीने की देरी के लिए पर्याप्त कारण नहीं बताए गए हैं और राजस्व मंडल का आदेश कानून के अनुरूप है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि विलंब माफी संबंधी प्रावधानों का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि तकनीकी आधार पर किसी व्यक्ति के अधिकारों का हनन करना। अदालत ने माना कि राजस्व मंडल ने ग्रामीणों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति पर पर्याप्त विचार नहीं किया।

अब दोबारा होगी सुनवाई

हाईकोर्ट ने राजस्व मंडल का आदेश रद्द करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है। अब राजस्व मंडल सभी पक्षों को सुनने के बाद नए सिरे से मामले का निर्णय करेगा। इस फैसले को न्याय तक समान पहुंच और कमजोर वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


संबंधित समाचार