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चांदा-मुनारा गायब, सीमांकन प्रभावित: बढ़ रहे जमीन विवाद, न्यायालयों में लंबित प्रकरण में इजाफा

चांदा-मुनारा गायब, सीमांकन प्रभावित: बढ़ रहे जमीन विवाद, न्यायालयों में लंबित प्रकरण में इजाफा

सैय्यद वाजिद// मुंगेली: छत्तीसगढ़ प्रदेश सहित मुंगेली जिले के कई ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भूमि विवादों का एक प्रमुख कारण राजस्व अभिलेखों में दर्ज चांदा-मुनारा (स्थायी सीमा चिन्ह) का मौके से गायब होना बनता जा रहा है। चांदा-मुनारा के अभाव में राजस्व विभाग को जमीनों का सटीक सीमांकन करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर भूमि विवादों के निराकरण पर पड़ रहा है। वर्षों पूर्व किए गए राजस्व सर्वेक्षण के दौरान खेतों और भूखंडों की सीमाओं को चिन्हित करने के लिए चांदा-मुनारा स्थापित किए गए थे। समय के साथ अतिक्रमण, निर्माण कार्य, प्राकृतिक कारणों अथवा मानवीय हस्तक्षेप के चलते अनेक स्थानों से ये चिन्ह गायब हो गए हैं। परिणामस्वरूप जब किसी भूमि का सीमांकन कराने की आवश्यकता पड़ती है, तब राजस्व अधिकारियों को मूल आधार बिंदु ही उपलब्ध नहीं हो पाता..!

राजस्व विभाग के लिए सीमांकन की जटिल समस्या

भूमि विवादों के बीच राजस्व व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि मुंगेली जिले में वर्ष 1954 के बाद नियमित बंदोबस्त (सेटलमेंट) नहीं हुआ है,दशकों पुराने नक्शों और अभिलेखों के आधार पर किए जा रहे सीमांकन आज की वास्तविक भौगोलिक स्थिति से मेल नहीं खाते, जिससे किसानों और भूमिधारकों के बीच विवाद बढ़ रहे हैं।सबसे बड़ी समस्या सीमांकन प्रक्रिया में एकरूपता का अभाव बताया जा रहा है। आरोप है कि अलग-अलग राजस्व दलों द्वारा एक ही भूमि का सीमांकन करने पर अलग-अलग रिपोर्ट सामने आते है। इतना ही नहीं, यदि किसी भूमि का सीमांकन एक गांव को आधार मानकर किया जाए तो रिपोर्ट अलग होती है, जबकि उसी भूमि का सीमांकन पड़ोसी सरहदी गांव को आधार बनाकर करने पर परिणाम बदल जाता है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर वास्तविक सीमा कौन-सी मानी जाए।राजस्व मामलों से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि सीमांकन की अलग-अलग रिपोर्ट सामने आती हैं, तो इससे प्रशासनिक निर्णयों की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। कई मामलों में वर्षों तक विवाद समाप्त नहीं हो पाते और पक्षकारों को बार-बार राजस्व कार्यालयों तथा न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं,सबसे अधिक प्रभावित नगरीय क्षेत्र की बेशकीमती जमीनें हैं। शहर के विस्तार के साथ इन भूमि की कीमत कई गुना बढ़ चुकी है, जिसके कारण सीमांकन में जरा-सी विसंगति भी बड़े भूमि विवाद का रूप ले लेती है। कई मामलों में एक ही जमीन पर अलग-अलग दावे सामने आते हैं, जिससे वर्षों तक न्यायालय और राजस्व कार्यालयों में विवाद लंबित रहते हैं।

न्यायालयों में बढ़ रहे भूमि विवाद का हुआ इजाफा

भूमि स्वामित्व, कब्जा, सीमांकन,बटांकन और अतिक्रमण से जुड़े अनेक मामले वर्तमान में न्यायालयों में विचाराधीन हैं। मूल चांदा-मुनारा उपलब्ध नहीं हैं और आधुनिक तकनीक से पुनः सर्वेक्षण नहीं कराया जाता, तो ऐसे मामलों का त्वरित और निष्पक्ष निराकरण कठिन होगा।कई ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और भू-स्वामियों का आरोप है कि राजस्व नक्शों के अनुसार उनकी भूमि की स्थिति कुछ और है, जबकि वास्तविकता में वर्षों के दौरान सीमाएं बदल चुकी हैं। कहीं रास्ते बदल गए, कहीं नालों और मेड़ों का स्वरूप बदल गया, तो कहीं अतिक्रमण के कारण भूमि की वास्तविक स्थिति प्रभावित हुई है। इससे विवाद और अधिक जटिल हो रहे हैं।

आधुनिक तकनीक से हो समाधान,एमपी की जिओ रिफ्रेन्सिंग से सटिक भूमि का होगा माप 

भूमि विशेषज्ञों और नागरिकों का मानना है कि पुराने रिकॉर्ड और गायब हो चुके सीमा चिन्हों पर निर्भर रहने के बजाय सरकार को आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए पुनः सर्वेक्षण कराना चाहिए। ड्रोन सर्वे, जीपीएस आधारित मापन और डिजिटल भू-अभिलेख प्रणाली के माध्यम से जमीनों का पुनः सत्यापन कर स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।छत्तीसगढ़ सरकार अगर इसका मूल समाधान चाहे तो मध्यप्रदेश की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी जियो-रेफरेंसिंग (Geo-Referencing) आधारित भू-अभिलेख प्रणाली लागू की जानी चाहिए, ताकि प्रत्येक भूमि का सटीक डिजिटल लोकेशन रिकॉर्ड तैयार हो सके और सीमांकन संबंधी विवादों पर स्थायी रोक लगाई जा सके।


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