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वन भूमि डायवर्जन पर बड़ा खुलासा, 28 लाख पेड़ों की कटाई को मिली मंजूरी

वन भूमि डायवर्जन पर बड़ा खुलासा, 28 लाख पेड़ों की कटाई को मिली मंजूरी

देश में विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग को लेकर एक नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच केंद्र सरकार ने विभिन्न परियोजनाओं के लिए 28 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी। इस अवधि में सबसे अधिक स्वीकृतियां खनन परियोजनाओं से जुड़ी रहीं, जबकि पेड़ कटाई के मामलों में छत्तीसगढ़ शीर्ष पर रहा।

अधिकांश प्रस्तावों को मिली स्वीकृति

वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम के तहत गठित सलाहकार समिति के समक्ष इस अवधि में कुल 288 प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए थे। इनमें से 242 परियोजनाओं को अनुमति प्रदान की गई, जिससे स्पष्ट होता है कि 80 प्रतिशत से अधिक प्रस्तावों को स्वीकृति मिली। इन परियोजनाओं के लिए हजारों हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वानिकी कार्यों में उपयोग करने की अनुमति दी गई।

खनन परियोजनाओं का सबसे बड़ा हिस्सा

रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक पेड़ों की कटाई खनन परियोजनाओं के लिए स्वीकृत हुई। इसके अलावा जलविद्युत परियोजनाएं और पुनर्वास से जुड़े प्रोजेक्ट भी प्रमुख रहे। इन तीन श्रेणियों में कुल स्वीकृत पेड़ कटाई का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा शामिल है। रिपोर्ट बताती है कि औद्योगिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विस्तार के कारण वन क्षेत्रों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा पेड़ कटाई की अनुमति

पेड़ों की कटाई की मंजूरी के मामले में छत्तीसगढ़ देश में पहले स्थान पर रहा। सरगुजा क्षेत्र की केते एक्सटेंशन ओपनकास्ट कोयला परियोजना के लिए चार लाख से अधिक पेड़ हटाने की अनुमति दी गई। इस परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर वन अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों पर विरोध भी दर्ज किया गया था।

कई परियोजनाओं में अधूरी जानकारी

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि दर्जनों परियोजनाओं में पेड़ों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया। कुछ मामलों में वन भूमि के बड़े हिस्से को डायवर्ट करने का प्रस्ताव था, लेकिन उससे प्रभावित होने वाले पेड़ों का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं था। इससे पर्यावरणीय प्रभाव के सही आकलन को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।

पर्यावरणीय असर पर विशेषज्ञों की चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर वन भूमि डायवर्जन से जैव विविधता, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास, जल स्रोतों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि कुछ परियोजनाओं में प्रभाव को सीमित बताया गया है, लेकिन रिपोर्ट में कई स्थानों पर संभावित पर्यावरणीय जोखिमों का भी उल्लेख किया गया है।

 


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